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मैं तुमसे ज़्यादा पढ़ी-लिखी हूँ .....

Posted On: 30 Jul, 2012 Others,मेट्रो लाइफ में

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रजनी की शिक्षा पूरी हुई की तुरंत ही उसको सरकारी नौकरी मिल गयी, ये तो सोने पे सुहागा वाली कहावत चरितार्थ हुई थी| नही तो जाने कितने ही युवा उच्च शिक्षा प्राप्त कर बेरोज़गार ही घूमते दिख जाते हैं| रजनी का परिवार ग्रामीण प्रिवेश में रहते हुए भी शिक्षित था, किंतु अपनी सामाजिक परंपराओं को नही भुला था| वो ही संस्कार उन्होने अपनी बेटी में भी डाले थे| अब रजनी के पास उच्च शिक्षा के साथ साथ सरकारी नौकरी भी थी| पिता ने पूछा बेटी कोई लड़का तुझे पसंद हो तो बतला दे, ताकि हम लड़के को और उसके खानदान को देख कर तुम्हारी शादी उसके साथ कर दें| किंतु मर्यादाओं और परम्परा में पली बढ़ी रजनी ने सॉफ शब्दों में कहा पिताजी पढ़ाई के दौरान मुझे किसी दूसरी तरफ देखने का कोई अवसर ही नही मिला तो में किसी दूसरी तरफ देखती, शायद ऐसे कुछ करती तो हो सकता है जिस मुकाम तक अब पहुँची हूँ वो मुझसे आज भी कौसों दूर होता| बेटी के विचार सुन पिता का सीना गर्व और खुशी से चौड़ा हो गया| पिता ने बेटी के लिए उचित वर की ख़ौज़ शुरू कर दी, काफ़ी ख़ौजबीन के बाद राजेश के रूप में उसको अपनी बेटी के लिए उचित लड़का मिल ही गया| उसकी नज़रों में राजेश उसकी बेटी को खुश रखने में कोई कोर कसर नही छोड़ता| सुंदरता, नेक नियती, सम्मान और आदमी का आदर करने में राजेश, रजनी से कुछ 21 ही पड़ता था|

तय समय पर राजेश और रजनी की शादी बड़े ही धूम धाम से हुई | इस शादी में जिसने भी शिरकत की वो ही चकित था, लड़की और लड़के की जोड़ी बहुत ही सुंदर लग रही थी, रजनी के पिता ने अपनी हैसियत से बढ़ कर अपनी बेटी को उपहार दिए थे और राजेश के पिता ने भी अपनी बहू को सोने के गहनों से लाद दिया था| दोनो ही परिवार बड़े ही खुश थे इस शादी को लेकर| लड़का लड़की दोनो ही अच्छे पढ़े लिखे और दोनो ही सरकारी नौकरी पर थे| दोनो परिवारों का समाज में रसुक भी था| शादी हुई सबकुछ पहले की भाँति अपनी पटरी पर चल पड़ा| राजेश रजनी दोनो अपनी अपनी नौकरी पर जाते, खुशी खुशी समय बीतने लगा| जैसा की रजनी के पिता ने सोचा था राजेश उससे भी कुछ आगे ही निकला| वो रजनी को भरपूर प्यार करता| एक दिन मज़ाक मज़ाक में ही रजनी ने राजेश से कहा तुम और मैं दोनो ही तो नौकरी करते हैं, मेरी पोस्ट तुमसे बड़ी है, तनख़्वा भी तुम से ज़्यादा है, मैं तुमसे ज़्यादा पढ़ी-लिखी भी हूँ, तो फिर काम मेरे ज़िम्मे ज़्यादा क्यूँ| राजेश अपनी पत्नी का आश्य समझ गया और उसने तुरंत समाधान कर दिया, बोला ठीक है हम काम को भी बराबर बाँट लेते हैं, एक साप्ताह तुम खाना बनाना एक साप्ताह मैं खाना बना लूँगा| जिस साप्ताह तुम खाना बनाओगी उस साप्ताह मैं कपड़े धो लूँगा, और जिस साप्ताह खाना बनाने का नंबर मेरा हो उस साप्ताह तुम कपड़े धो लेना| दोनो में डील तय हो गयी| (जो सार्वजनिक नही थी सिर्फ़ पत्नी पति के बीच हुई थी|)

जीवन ठीक से चल रहा था, कि राजेश के पिताजी का शहर आना हुआ| और वो आए उसी साप्ताह जिस साप्ताह राजेश का नंबर था खाना बनाने का| सांझ को राजेश ने होटेल से खाना मँगवाया, लेकिन गाँव से आया हुआ बुजुर्ग, घर में बहू होते हुए भी होटल का खाना खाए ये राजेश के पिता को गंवारा नही था| तो उसने खाना नही खाया और भूखा ही सो गया| शुबहा हुई राजेश और रजनी को ड्यूटी जाना था, राजेश ने पिताजी से कहा पिताजी फ़्रिज़ में दूध और ब्रेड रखे हैं, दिन में भूख लगे तो खा लेना, खाना ड्यूटी से आकर बनाएँगे| बेटे के घर का हाल पिता के अनुभव ने परख लिया था तो उसने कहा नही बेटा नही मुझे घर जाना हैं, तुम लोगो को देखने का मान हुआ था सो आ गया| बड़ा ही अच्छा लगा तुमसे मिलकर और ���ुम्हारी हँसी खुशी चल रही शादीशुदा जिं��गी ���������������ो देख कर| राजेश के पिताजी अपनी बहू और बेटे को आशीर्वाद दे कर चले गये|

राजेश और रजनी अपने अपने ओफिस| राजेश का मन कही अंदर से उसको धिक्कार रहा था, पिता ने अनकहे शब्दों में उसको बहुत कुछ कह दिया था| इसी उधेड़ बुन के बीच राजेश ने रजनी को फ़ोन किया की तुम्हारे पिताजी अचानक बहुत बीमार हो गये हैं और उनको मिलने के लिए गाँव जाना है, मैं तुरंत तुम्हे लेने तुम्हारे ओफिस आ रहा हूँ| दोनो तुरंत रजनी के गाँव पहुच गये, गली के रास्ते में एक आदमी मिला तो राजेश ने रजनी को घर चलने को कहा और वोला मैं इनसे मिल कर आता हूँ| रजनी घर चली गयी| बेटी को अचानक घर आया देख घरवाले खुशी और आसमंजश की स्थिति में थे, कुशलता पूछ कर पिता ने पूछा, बेटी जमाई राजा नही आए? रजनी ने कहा वो आए हैं रास्ते में एक आदमी मिल गया था उसीसे बातचीत करने लगे, आते ही होंगे| 1 घंटा बिता तो पिता ने सोचा क्यूँ ना उस आदमी के घर चला जाए, इतनी देर तो किसी दूसरे के घर नही लगनी चाहिए| रजनी के पिता वहाँ गये तो दामाद जी वहाँ नही थे, पूछने पर पता चला दामाद जी तो सिर्फ़ राम राम कर पानी पी कर तुम्हारे घर की ओर चले गये थे| रजनी की पिता ने घर आकर रजनी से पूछा बेटी जमाई जी के साथ कुछ कहा सुनी तो नही हुई| नही पिता जी कुछ नही हुआ, शुबह ठीक ठाक ओफिस गये थे, कि अचानक उनका फ़ोन आया और तुम्हारे बीमार होने की खबर देकर कहा पिताजी से मिलने जाना है, और हम यहाँ आ गये|

रजनी के पिता ने तुरंत गाड़ी निकाली और राजेश के गाँव गया| (उन्होने दुनियादारी देखी थी तो अंदाज़ा लगा लिया था कि राजेश कहाँ मिल सकता है) वहाँ पहुच कर राजेश से पूछा बेटा बतला क्या बात हुई जो अचानक तुम रजनी को घर छोड़ आए| राजेश ने स्पष्ट शब्दों में कहा मुझे कुछ नही मालूम, ये तो आप अपनी बेटी से पूछे| रजनी के पिता तुरंत अपने घर चले और वहाँ जाकर रजनी से पूछा| रजनी का वो ही पुराना जवाब सुनकर पिताजी को गुस्सा आ गया और उसने सख्ती से रजनी से कहा लड़की हुआ तो ज़रूर है कुछ तो ग़लत हुआ है जो तुम मुझे नही बतला रही, और राजेश भी नही बतला रहा, वो तो हमारा दामाद है किंतु तुम हमारी बेटी है और मैं तुम से ही कारण जानना चाहूँगा| रजनी ने कहा पिता जी ऐसी कोई बात नही हुई हाँ सिर्फ़ राजेश और मेरे बीच एक डील हुई थी (रजनी ने डील वाली कहानी सुनाई)| इस बीच राजेश के पिता जी कल हमारे पास शहर मिलने गये थे, खाना बनाने का नंबर राजेश का था किंतु ना जाने उसने क्यू खाना नही बनाया?

एक जोरदार आवाज रजनी के कान के निचे हुई, ऐसा धमाका हुआ जैसे दिन में तारे नजर आ जाये (रजनी के पिता ने पहली बार अपनी बेटी पर हाथ उठाया था), रजनी के पिता की आवाज कुछ देर बाद उसको सुने दी, तुम पति पत्नी के बिच क्या होता है क्या नहीं होता है इससे हमें कोई मतलब नहीं किन्तु अपने ससुर के साथ तुने क्या किया ये तुझे पता चलना चाहिए, राजेश के पिता के स्थान पर यदि मैं तुम्हारे घर आया होता तो क्या तुम अपनी बारी न होने पर खाना नहीं बनाती| रजनी को अपनी गलती का अहसास हो गया था| उसने तुरंत अपने असली घर की तरफ रुख किया (रजनी के पिता उसको घर छोड़ आये) और वहां जाकर अपने सशुर से अपने द्वारा किये गए व्यहार की माफ़ी मांगी| राजेश ने भी रजनी की आँखों में पश्चाताप के अंश्रु देख लिए थे| रजनी ने अपने अहंकार को त्याग कर अपना पत्नी धर्म निभाना शुरू किया और राजेश अपना पति धर्म उसी प्रकार से निभाता रहा जैसा वो पहले निभा रहा था|



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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

pitamberthakwani के द्वारा
August 5, 2012

महामहिम विजय जी, सादर, आप मेरे विचारों को भी पढ़कर यदि कोई विचार दे सकें तो आभारी हूँगा. ये आपके विचार मेरे लिए आशीर्वाद का काम करेंगे जी ,आशा है निराश न करेंगे.

    vijaybalyan के द्वारा
    August 5, 2012

    bade bhai sahab, prnam! main ek choti si jivatma hun, mujhe itne bade shabdon ke bojh tale na dabao. ek anpadh admi aap jaise jayan swarupi ke prshno ka uttar kaise de sakta hai, fir bhi yadi aap ko lagta hai ki mere andar kuch hai jo aapke prshno ka jawab de sakta hai to, ye aapka badappan hai koshish karunga apni choti aur murkh buddhi se aapke prshno ka jawab dene ki ….. aapki ummid par kitna khara utarta hun ye to aap hi jane. ek iltja hai, yahan par mujhe hindi mein jawab kanvart nahi karna aate yadi sambhav ho to mujhe jyan prdan karne ka kasht karen….. shukria

rekhafbd के द्वारा
August 2, 2012

आदरणीय विजय जी ,सादर नमस्ते ,अति सुंदर रचना पर बहुत बहुत बधाई आजकल जमाना बदल गया है और ऐसी प्राब्लम्स अक्सर पति पत्नी में होती रहती है ,आभार

    vijaybalyan के द्वारा
    August 2, 2012

    Rekha ji, prnam! kahani pasand aayi, shukria….

manoranjanthakur के द्वारा
August 1, 2012

उम्दा रचना सुंदर प्रस्तुति बधाई

    vijaybalyan के द्वारा
    August 1, 2012

    manoranjan thakur ji, prnam! bhai sahab honshla badhane ke liye shukria…..

pitamberthakwani के द्वारा
July 30, 2012

विजय जी “मै तुमसे ज्यादा पढी लिखी हूँ” कहानी ने मुझे हिला कर रख दिया कहानी के बीच सचमुच रोता ही रहा और दिन भर यह कहानी मुझे रुलाती ही रही न जाने और कब तक रुलाती रहेगी.आपने जोलिखा है सही में हर सह्रदय को रुलाये बिना नहीं रहेगी आपकी रचना के लिए आभार!

    vijaybalyan के द्वारा
    July 31, 2012

    Pitamberthakwani ji, prnam! sir ji, apko kahani andar tak pasand aayi lagta hai meri ye rachna to safal hui hi. agli rachna ke liye apne mere andar pram vayu bhar di agli rachna “Shadi do jismo ka milan ya to atmaon ka bandhan” jaldi ho post karunga.


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