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अन्ना के कंधे से फिर चली कांग्रेस की बन्दुक

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अन्ना सभी के लिए सही नही हैं और सभी के लिए ग़लत भी नही हैं| मेरे लिए भी अन्ना ग़लत नही थे और ग़लत आज भी नही हैं, किंतु फिर भी कुछ प्रश्न मेरे मन में ज़रूर उठते हैं, शायद सबके मन में उठते होंगे| जिस प्रकार से अन्ना का आन्दोलन आगाज हुआ था और जिस तरह से इस आन्दोलन की अर्थी तैयार हुई उसको देखते हुए आशंका मन में होती है| होना भी चाहिए किसी के भी प्रति अंध भक्त नही होना चाहिए|

जो प्रकरण हुआ उससे तो साफ़ हो जाता है की यदि किसी पार्टी को सत्ता का सुख भोगना आता है तो वो है सिर्फ और सिर्फ कांग्रेस| मेरा भी ये मानना है कि कांग्रेस से बढ़िया राज करने वाली पार्टी कोई नही|  कुछ कारण साफ़ है, अपनी बुद्धि से थोडा सा विश्लेषण करने की कोशिश करता हूँ -

जब अंग्रेजो ने कांग्रेस को सत्ता का हस्तांतरण किया तो पहले चुनाव में कांग्रेस को सत्ता की बागडोर मिली| समय बिता और जैसा की होता है जनता को बहुत सी शिकायते सत्ताधारी दल से हुई और आज़ादी के बाद का सबसे बड़ा जनांदोलन खड़ा हुआ| जे. पी. साहब ने बिखरी हुई छोटी मोटी पार्टियों को एक जगह खड़ा किया (एक सूत्र में बँधा नही)| विपक्षी दल मौके की तलाश में थे और जनता कांग्रेस के राज से त्रस्त थी, शायद वो एक जन आन्दोलन न हो कर विपक्षी दलों का सत्ता हथियाने का एक रास्ता था| बड़े जोरों की राजनीतिक आँधी चली और उस आँधी में कांग्रेस रूपी वट व्रक्ष के पत्ते झड़ गये| कांग्रेस से लोग तंग थे  और किसी ठंडी छाँव की आस लगाए हुए थे| आस के बादल लाए थे जे. पी. साहब किंतु जिस प्रकार से बादल लंबे समय तक नही बने रहते उसी प्रकार से वो भानुमति का कुनबा (जनता पार्टी) बिखर गया| बिखराव का सीधा सीधा कारण था लालच, कुर्सी एक और दावेदार सभी| राजनीतिक दल अपनी अपनी महत्वकांशा के चलते हुए सत्ताधारी दल के खिलाफ एक जुट हुए थे, न की व्यस्था के खिलाफ जबकि जनता व्यस्था से परेशान थी | जनता को जो हस्र होना था वो हुआ जनता छली गयी| किंतु कुछ अच्छा भी हुआ (?) उस आंदोलन से बड़े बड़े यादव महारथी मुलायम और लालू, रामबिलास आदि आदि निकल कर आए जो आज राज कर रहे हैं|

कांग्रेस की स्थापना एक अंग्रेज ने की थी और अँग्रेज़ों को राज करना आता है, 1947 में अंग्रेज तो चले गये किंतु सत्ता तो आज़ादी के बाद भी अंग्रेज़ो सा जीवन जीने वाले, अंग्रेज़ो जैसे सोच रखने वाले के पास ही थी, (जो आज भी है और देशी लोग दूंम हिलाते हैं उनके आगे पीछे|) सो कांग्रेस को कुछ भी समय नही लगा और दुबारा से सत्ता पर काबिज हो गयी|

कुछ समय बाद विपक्षी दलों को सत्ता की कुर्सी फिर से ललचाने लगी, किंतु किसी भी पार्टी के पास कोई उचित मुद्दा नही था, भूख, बेरोज़गारी आदि से पीड़ित जनता इसको आदि हो चुकी थी, राज था गरीब की पार्टी कांग्रेस के हाथो में, तो ये कोई खास मुद्दा नही बन सकता था, | तभी एक बार फिर से जनता को छलने की साजिस हुई,  इस बारी धार्मिक कार्ड फेंका और बहू शंख्यक जनता को अपने तरफ झुका लिया| जनता ने भी भरपूर साथ दिया एक दो नही बल्कि तीन तीन बार| जनता बड़ी घाग है, जिसको अर्श पर पहुचाना चाहती है उसको पहुचा कर ही दम लेती है, उस समय सिर्फ़ एक भगवा पार्टी एक तरफ थी और बाकी सभी (अपने को सेकुलर बतलाने वाली) पार्टियाँ एक तरफ| बड़ी कोशिश की उन पार्टियों ने, आख़िर अटल बिहारी बाजपाई जी को भी कहना पड़ा “सभी लगे हैं लाठी लेकर हांकने, ताकि हम सत्ता में नही आ सके|” किंतु जनता की ताक़त तो जनता की ताक़त थी और उसने अटल जी को प्रधान की कुर्सी सौप ही दी सिर्फ़ एक आस में की हमे रोटी/पानी नही चाहिए, रोज़गार नही चाहिए, सिर्फ़ राम मंदिर चाहिए, राम मंदिर के खातिर ना जाने कितने ही परिवारों ने अपने कमाउ पुतो को खोया था| अटल जी ने खूब कुर्सी का सुख भोगा, बड़ी ही सिद्दत से भोगा, किंतु जनता की भावनाओ को नज़र अंदाज कर दो कुँवारीओ (ममता ललिता) के बीच झूलते रहे और कब कांग्रेस फिर से कुर्सी छीन ले गयी मालूम ही नही चला| पार्टी हाशये पर गयी और अटल ने सन्यास ले लिया| आज पार्टी का हाल ये की मजबूत दावेदार मोदी की लुटिया डुबोने में पार्टी वाले ही कसर नही छोड़ रहे| बेचारी कुर्सी के भाग्य का फ़ैसला होना है 2014 में और चिल-पों अभी से मची है|  अब तो इसके वरिष्ठ नेता भी अपना तो क्या कांग्रेस का भी प्रधान मंत्री नहीं देख रहे हैं आने वाले चुनावों में| खैर चलो लोकतंत्र है ये ऐसे ही चलता है, जनता को हमेशा ही छलता है| कांग्रेस राज करती रही है और करती रहेगी|

अबकी बारी जनता बुरी तरह से पीड़ित है, देश में विपक्ष नाम की कोई चीज नहीं है, जो सरकार पर लगाम लगाये| भूख, प्यास की आदि जनता अब भ्रस्ताचार से ज्यादा त्रस्त हुई, उसके भले के लिए बनी किसी भी योजना का लाभ उसको नहीं मिल रहा था, ऊपर से छोटे मोटे काम करवाने को चक्कर पर चक्कर काटने के बाद भी बाबु उसको घास नहीं डालता, बाबु को अफसर घास नहीं डालता और ये सिलसला ऊपर तक चलता था| घोटालों का दौर जोरों पर था, ऐसे में जनता को आस थी कोई मसीहा आएगा और उसके दुखो को दूर करेगा|

इस बीच दबे पाव बिना किसी लालच के एक फ़ौजी महाराष्ट्र में समाज सेवा कर रहा था| उत्तर भारत में सिर्फ़ वो ही लोग उनको जानते थे जो समाचार आदि पढ़ते थे या देश की हर हिस्से की खबर रखते थे| बहुत से इमानदर लोगो ने “सिविल सोसायटी” समूह तैयार किया (कुछ ग़लत लोग भी इसके साथ जुड़े हो सकते हैं, किसी के अंदर तो घुस कर नही देखा जा सकता)| किरण बेदी को तो दिल्ली वाले अच्छी तरह जानते हैं, उनकी कर्तव्य निष्टा पर कोई उंगली नही उठा सकता, और भी जो लोग जुड़े हैं वो सब किसी ना किसी प्रकार से इस तंत्र से आजिज आ चुके थे और उनको एक ऐसा नेता चाहिए था जो निस्कलंक और सत्यनिष्ट इमानदर हो और वो मिला अन्ना हज़ारे जी के रूप में| सिविल सोसायटी का मकसद देखने में व्यस्था परिवर्तन लाना लगता था| मेरा सीधा सा सोचना है यदि व्यवस्था परिवर्तन हो गया तो काला धन अपने आप ही दौड़ा चला आएगा| खैर ठीक है सिविल सोसायटी ने वो सब किया जिससे जनता के बीच पहुचा जा सकता था, जीतने भी लोग इससे जुड़े वो सब इस भ्रष्ट तंत्र से तंग थे उनको काले धन से कोई वास्ता नही, वो धन जनता के घर नही आना, किंतु यदि ये भ्रष्टाचार ख़त्म हो तो उसको कुछ राहत की साँस मिले और उसके छोटे मोटे काम हाल हो जाए| इस लिए जनता ने खुल कर अन्ना का साथ दिया| यहाँ पर कांग्रेस ने भी ग़लती पर ग़लती की और अन्ना एक बहुत बड़ा जनांदोलन  खड़ा करने में कामयाब हुए| (न जाने इस समय कांग्रेस ने जानबूझ कर गलतियाँ की या ये गलतियाँ ना समझी के कारण से हुई| किन्तु लगता नहीं की गलतियाँ अनजाने में हुई|) समय बिता और बहुत कुछ बदल भी रहा है, बहुत से भ्रास्ताचारी पकड़े जा रहे हैं, उनके साथ होना क्या है ये तो सबको मालूम है, जब कसाब बाहर से आ कर देश की आर्थिक राजधानी को जला कर भी सरकार का जमाई बना हुआ है तो ये तो फिर भी अपने ही हैं, और किसी का कत्ल भी नही किया|

अन्ना का आन्दोलन किसी पार्टी का आन्दोलन न हो कर जनता का आन्दोलन बना ये ही कारण है तीसरे दौर में कोई भी पार्टी इस आन्दोलन से नहीं जुड़ पाई, शुरू में जो पार्टियाँ इससे जुड़ने का ढोंग कर रही थी उनकी भी कलई खुल चुकी थी, उपरी रूप से तो वो साथ थी किन्तु अन्दर से वो ज्यादा भयभीत थी, इस आन्दोलन से आन्दोलन का मकसद साफ़ था व्यस्था परिवर्तन और ये होता है तो रस्ते तो सभी राजनितिक पार्टियों के बंद होते हैं| कोई नहीं जनता के सामने एक आस का दिया तो जला है, परिवर्तन की सुगबुगाहट तो शुरू हुई|

लोगो को चाहे कितना ही लगे की अन्ना ने तो राजनीति में आना ही था तो ड्रामा क्यूँ किया, हर मीडिया चैंनल अपनी अपनी भाषा में तोड़ मोड़ कर खबर को प्रासरित कर रहा है, किंतु अन्ना ने खुद राजनीति में आने की नही कही उन्होने राजनीतिक विकल्प देने की बात कही है और वो भी जनता से पूछ कर| कुल मिला कर इस बार अन्ना ने मंझदार में नही छोड़ा बल्कि बल्कि धारा को ही जनता की तरफ मोड़ दिया है|  जनता! मुझे इमानदर, सच्चा और कर्तव्यनिष्ट आदमी दो ताकि मैं इस दलदल में एक सॉफ सुथरी पार्टी आप लोगो को 2014 में दे सकूँ| अब तो जनता के विवेक पर निर्भर करता है वो कैसा प्रतिनिधि चुनती है| क्या इतने कम समय में कोई पार्टी खड़ा करना आसान है, क्या पूरे भारत में इतने इमानदर लोग मिल सकते हैं जो चुनाव जीत कर व्यवस्था परिवर्तन कर सके?  अब फ़ैसला जनता को करना है, अपने बीच से एक इमानदर, सच्चा और अपना छोड़ जनता का भला चाहने वाला प्रतिनिधि अन्ना को सौपे| किंतु अब सवाल खड़ा होता है विकल्प कैसे होंगे, क्यूंकी इमानदर लोगो के पास धन है नही, और धन के बिना चुनाव लड़ा तो दूर चुनाव में खड़ा होना भी मुस्किल है| और जो धनवान है क्या वो इमानदर हो सकता है? सच्चाई ये है कि आज एक इमानदर आदमी अपने कुनबे को अपने साथ नही ले कर चल सकता वो लोक सभा के चुनाव में इतनी बंटी हुई जनता के वोट कैसे हाँसिल करेगा?

इतने कम समय में ये सब संभव नहीं है और इस आन्दोलन के कारण जनता का सभी पार्टियों पर से भरोसा उठा है, अंत में जनता को लगेगा की बाकि तो सत्ता के लालची हैं, तो जो सत्ता में है उसको ही बना रहने दें| इसी सोच को देखते हुए लगता है 2014 में फिर से कांग्रेस का ही राज आने वाला है, चाहे किसी भी रूप में हो, क्यूंकी आज कोई भी पार्टी ऐसी नही है जो कांग्रेस का विकल्प बन सके| चलते चलते हमारे एक मित्तर की चंद लाइने याद आ गयी, बहुत सही और गहरी बात है यदि कोई समझ सके तो :-

नेताओँ से मांगना हमको नहीँ पसंद , उनके सम्मुख मांगपत्र रखना कर दो बंद ।
रखना कर दो बंद, मांगना छोड़ दीजिए , वे न देँ अधिकार तो नाता तोड़ लीजिए ।
आपने मत का दान दिया है , आप हैँ दाता , नेता नहीं आप हैँ उनके भाग्यविधाता ।          – कृष्ण गोपाल विद्यार्थी

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