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9 कन्या आये हाँ जो सिर्फ ब्राह्मण हों........

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कन्या या किसी भूखे को खाना खिलाना बड़ा ही शुभ होता है, ऐसी हिन्दू मान्यता है (किस ग्रंथ में लिखा है मुझे नही मालूम, किन्तु नकल करके ऐसा करते सभी हैं)| हाँ हमारे पवित्र कहे जाने वाले ग्रंथो में स्त्री को देवी (पूजने) का रूप जरूर माना जाता है, और ढोंग रूपी (किसी को आपत्ती हो तो अपने पास रखे) मान्यता के कारण उसको पूजते हैं (घर में असली को नही, मंदिर में रखी मूर्ति को) बकायदा इनके नाम से वर्ष में दो बार 9 दिन आरक्षित हैं| बहुत से हिस्सों में कुछ वर्षो पहले तक इन आरक्षित दिनो के बारे में किसी को मालूम नही था| ये तो भला हो जागरुकता का (दिखावे) जो आज जिसे देखो वो माता के नौ रात्रे मानता है| भूखे (व्रत) भले ही ना रहे, किन्तु आठम और नोवमी के दिन कन्या जरूर तलाशता है| कन्या ब्राह्मण की हो तो सोने पर सुहागा, नही मिले तो अपनी जाति की या सजातिय मिल जाये| एक-एक कन्या 10-10 घरों में जाकर जीमणा (खाना खाना) होता है| (क्यूंकि कन्या मिलती ही नही हैं, मतलब सप्लाई कम और डिमांड ज्यादा, सिर्फ इन दो दिनो में| ऐसा नही है की प्रोडक्शन में कमी है, बल्कि जैसे ही मालिकों को मालूम होता है खेती हरी हो चुकी है वो बीज की जांच करवा लेते हैं और जांच में कन्या बीज निकलता है तो खराब बीज समझ कर उसको खत्म कर दिया जाता है| ये सब करते हैं धरती पर भगवान समझे जाने वाले लोग और वो भी सिर्फ चन्द सिक्कों के लिये, फिर खोजते फिरते हैं धार्मिक कर्म करने के बाद कन्या को भोजन करवाने के लिये)| अब भले ही वो छोटी सी जान इतना ना खा सके, पहले घर में खाने के बाद दूसरे तक तो ठीक है …. उसके बाद के घरों में कितना खाती होगी ये तो आप प्रबुधजन समझ ही सकते हैं, क्यूंकि अपने से ही अंदाज लगा लो की हम एक समय में बार-बार कितना खाना खा सकते हैं| (मतलब दिखावे के कारण खाने की भी बरबादी होती है इन दिनो)

खैर छोडो, ये ठीक ही हो रहा है जो दिखावे के लिये ही सही एक दिन तो भूले भटके लोग कन्या को पूजते हैं, शायद जिस दिन भोजन करवाने को कन्या नही मिलेंगी तभी वो कन्या को खराब बीज समझ उसको नष्ट नही करेंगे| मुद्दे पर आता हूँ, जिन पंक्तियों ने मुझे ये लेख लिखने को प्रेरित किया (पिछले कुछ समय से में अपने ब्लॉग पर नही जा पा रहा था कोई तकनीकी खराबी थी) उसको ही बया करता हूँ …..

23 सितंबर (रविवार) 2012 को सांझ के 3 बजे, हम अपनी खुशियों की चाबी को लेकर् अमरपुरा धाम, राजगढ़ (राजस्थान) के लिये निकले| अमरपुरा धाम एक ऐसा धाम जहां पर छोटा बड़ा अमीर (वी.आई.पी.) गरीब आदि कुछ नही है| सब मिट्टी से पैदा हुए हैं और मिट्टी में ही मिलना है वाली तर्ज पर एक समान हैं| पिछले कुछ समय से मेरा यहाँ पर लगातार जाना हो रहा है| यहाँ पर वर्ष में एक बार बड़ा मेला लगता है और माता के आशीर्वाद से प्रशाद बाँटा जाता है, इस प्रशाद में एक शक्ति (माँ झाड़ीज्वाला जी के आशीर्वाद से) है की बड़ी से बड़ी बीमारी ठीक हो जाती है, घर में सुख समृधि आती है, ऐसा यहाँ पर आने वाले लोगो का मानना है| इस स्थान से लगाव का कारण मेरे लिये कुछ अलग है, एक तो ये कि भागदौड भरी जिंदगी से कुछ पल सुकून के निकल जाते हैं और दूसरा अमीर गरीब का भेद यहाँ पर नही है| खैर खुशियों की चाबी में लगातार सफर करते हुए हम सांझ को 7 बजे के आस पास अमरपुरा धाम पहुचे| बेहद भीड़ थी फिर भी किसी तरह भयंकर रेतीले पार्किंग वाले स्थान पर हमने अपना वाहन रोका और उसके साथ ही चद्���������������र निकाल कर लंबे हो गये (लगातार सफर के कारण थकान जो हो र���ी थी)| कुछ ही देर बाद ��मारी खुशियों की चाबी के पास एक XUV आ कर रुकी और उसमे सवार लोग भी बिछाने के लिये चादर निकाल कर पास ही रेत में लेट गये| जिसे देखो वो ही रेत में लेटा हुआ था चाहे कोई अपनी गाड़ी से आया हो या फिर सरकारी गाड़ी में भाडा भर कर आया हो या ट्रकों में डबल डेकर बना कर आये हों| लोगों ने अपने अपने अस्थाई चुहले लगा कर खाना बनाया खाया, कुछ लोग घर से बना कर लाये थे उन्होने भी रेत में ही बैठ कर खाना खाया| रात भर जागरण चला सब (कम से कम मैं) दुनियादारी भुला कर भक्ति में रमे हुए थे|

शुबहा खुले में हल्का होने और फिर खुले में सिर्फ 1 बाल्टी पानी से स्नान करने में अलग ही आनन्द आया| इन सब नियत कर्मो से निवरत हो कर मंदिर प्रांगण में (रस्सियों से मार्क किया हुआ) जाने पर पता चला कि पिछले कुछ दिनो से रामायण का ����ाठ चल रहा था वहां पर जिसका उस दिन समापन था, मन में व्रत किया की रामायण की समाप्ति के बाद ही कुछ अन्न ग्रहण करना है, सो सव इच्छा से कारसेवा में लग गया| कुछ समय में रामायण का पाठ शुरु हुआ और सारा का सारा वातावरण राममय हो गया, भीड़ इतनी कि हजारो लोग मंदिर से सामने बने शेड के नीच थे तो उससे ज्यादा शेड से बाहर कड़ी धूप में, शायद ये रामायण के पाठ का जादू था या उस मिट्टी की शक्ति का जो कड़ी धूप में भी लोग बड़ी ही शान्ती से टाप्ते रेत में बैठे थे| बीच बीच में जै श्रीराम की ध्वनी भी गुंजायमान हो रही थी| इस ध्वनि के अतरिक्त किसी भी प्रकार से कोलाहल का वहां पर कोई काम नही था|

रामायण के पाठ के बाद हनुमान चालीसा का बड़ा ही संगीतमय गायन हुआ| हनुमान चालीसा के बाद एक अनौसमेंट ने मुझे हिला दिया, लौडस्पीकर से एक ध्वनी गुंजायमान हुई प्रशाद का भोग लगाने के बाद कन्याओं को भोजन करवान है इसके लिये 9 कन्याएँ आ जाये, हाँ कन्याएँ सिर्फ ब्राह्मणो की ही हों| पहले तो मुझे अपने कानो पर विश्वास नही हुआ किन्तु जब बार-बार ये ही घोषणा हुई तो मैं अंदर से हिल गया और कुछ सवाल ज़हन में गूँज गये -

ब्राह्मणो की कन्या ही इस काज के लिये उपयुक्त क्यूं हैं?

क्या किसी और जाति की कन्या कन्या नही है?

क्या वो देवी का रूप नही हैं?

क्या वो किसी और रास्ते से इस धरती पर आई है?

जब सब लोग समान हैं तो फिर कन्या कन्या में ये भेद क्यूं?

बच्चे तो भगवान के रूप होते हैं, इंसान का बच्चा ही नही बच्चा तो जानवर का भी बड़ा ही अच्छा लगता है| फिर बच्चों में ये भेद क्यूं? ये लेख लिखने का मेरा ध्येय सिर्फ ये हैं कि यहाँ पर हर महजब, हर जाति का पाठक और ब्लॉगर वर्ग है, जो इसपर उचित टिप्पणी पेश कर सकते हैं|

हाँ एक बात तो कहना भूल ही गया लगभग 30 – 40 मिनिट तक अणौन्समेंट के बाद भी हजारों की उस भीड़ में से ब्राह्मणो की सिर्फ 4 कन्या ही मिल सकी थी|



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