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बूटों की ठक ठक पर पायल की झनक झनक...... भाग 1

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दोस्तो जैसा कि रंजन जी ने भानगढ़ के भूतों से मुलाकात का कार्यकर्म पूरा किया और उनके एक कॉमेंट पर मैने एक सच्ची घटना लिखने को कहा था उसी वादे को पूरा करने की कौशिश कर रहा हूँ| रंजन भाई साहब जितनी तो पकड नही है शब्दों पर किन्तु फिर भी कौशिश होगी की आप लोगों को निराशा हाथ ना लगे ……

गाँव में हमारा घर गाँव की सीमा पर था, घर से ठीक सामने खेत ही खेत थे, और कुछ ही दूरी पर एक छोटी सी नहर बहती थी| रात के सन्नाटे में झींगुरों की और पानी की कलकल ध्वनी बड़ी ही मधुर लगती थी उसके साथ ठंडी ठंडी हवा के झोंके आते थे| गाँव में अक्सर खुले आसमान में छत पर तारों भरी रात में सोने को मिलता| ढीली चारपाई में लेटने पर लगता था जैसे जन्नत में किसी पालने में लेटे हों| संयुक्त परिवार में लगभग सभी छत पर खुले आसमान के नीचे सोने का लालच करते थे, या ये कहें कि विधुत व्यवस्था ना होने के कारण मजबूरी थी| चाँदनी रात में जिस छत पर नजर पड़ती उसी पर चारपाई ही चारपाई नज़र आती थी| सोने से पहले मनोरंजन के रूप में कहानियों का दौर चलता तो पास पडौस की छतो से भी लोग आ जाते और कहानियों के दौर शुरु हो जाता, एक दो कहानी के बाद भूतों वाली कहानी / किस्सो का दौर चल पड़ता| कोई कोई कहानी तो रौंगटे खड़े कर देती थी| कभी कभी तो दादी डांट देती, नही सोने से पहले को भूतों की कहानी नही सुनते रात को डर लगेगा| लेकिन मान मुन्नवल के बाद वो मान जाती| चारों और से बड़े लोगों की चारपाइयों से घिरे होने के कारण हमे डर नही लगता था| (कुल मिलाकर भीड़ में डर नही लगता था)

इस बीच पिताजी के साथ शहर आना हुआ| हमे छोटेपन में मीठा खाने का बहुत चाव था, तो अक्सर कुछ ना कुछ मीठा हमारे पास रहता और बकरी की भांती हमारा मुंह चलता ही रहता था| शहर में हमारी बुआ जी का बड़ा सा मकान था, उसमे कई कमरे बने थे और बहुत से पेड़ भी आंगन में लगे थे| लगभग सभी कमरे किराये पर चढ़े हुए थे| उन्ही कमरों में से एक में हम भी रहते थे| एक दिन सांझ के समय उन्ही कमरों में से एक में बड़ी भी लगी थी, हम इत्मिनान से मीठा खाते हुए उस कमरे के सामने पहुचे और भीड़ को चीरते हुए अंदर घुस गये, जो नजारा देखा तो दंग रह गये 5-6 लोगो ने उसमें रह रही आंटी को दबा (हाथ पैरो को) रखा था और वो आंटी आदमी की आवाज में कुछ कुछ बक रही थी| इस बीच किसी की नजर मुझ पर पड गयी और उन्होने मुझे हाथ पकड कर ऐसे बाहर उड़ाया (धकेला) जैसे मीठे पर बैठी मक्खी को उड़ाया हो| मेरे कानो में सिर्फ एक आवाज ही आई इसमे तो भूत घुसा हुआ है और ये आ गया मीठा खाता हुआ, अपने घर चला जा नही तो भूत इसको छोड़ कर तेरे अंदर घुस जायेगा| तो भैया हम तुरंत घर की और लपके और जाकर नमक चाट लिया| कहानियों में सुना था नमक चाट लेने के बाद भूत नही चिपटते| (अब भी अक्सर कोई मीठा खाकर बाहर जाता है तो नमक जरूर चाट लेता है या उसको मूह के जायके को खराब करने के लिये मजबूर किया जाता है, नमक चटवा कर) ये घटना हमे इस लिये याद है क्यूंकि हमने उस कमरे में वो देखा जिसकी कल्पना भी नही की जा सकती थी….. एक औरत मरी-गिरि सी 30-40 किलो की जिसको 5-6 हट्टे कट्टे लोगो ने पकड रखा हो और वो उनके वश में नही आ रही थी, उनको बच्चे की भांती छिटक रही थी और पुरुष की आवाज में कुछ कुछ बके जा रही थी| सोचने का विषय था एक दुबली पतली औरत में इतनी शक्ति कहाँ से आई की वो 5-6 हट्टे कट्टे पुरुषो को बालको के भांती लगभग फैंक रही थी ���र ���क पुरुष की आवाज में कैसे बोल र��ी थी|

कुछ समय बा��� पित���जी का दिल्ली कैन्ट ताबदला हुआ (पिता जी भारतीय फ़ौज में थे) और हमारा सौभाग्य कि हमे सरकारी मकान मिल गया| जिस बिल्डिंग में हमे मकान मिला उसके ठीक सामने कब्रिस्तान था| कब्रिस्तान को पार करने के बाद एक गन्दे पानी का बड़ा सा नाला और उसके पार शमशान घाट| घर की छत से जलती चिताओं का धुआ सॉफ दिख जात��� था और खिड़कियों से लगभग पूरा का पूरा कब्रिस्तान| उस समय हमारी उम्र रही होगी ये ही कोई 15-16 साल| बड़े उन्नमुक्त स्वच्छन्द अपने में खोए खोए रहने वाले| कब्रिस्तान में जो मिया जी रहते थे उन्होने 3-4 भैंसे पाल रखी थी सो भैंस का शुद्ध दूध वहां से ले आते थे (दूरी ये कोई होगी 150-200 कदम की) मतलब मिया जी कब्रिस्तान की रखव�����ली भी करते थे और अपने बच्च�������� को पालने के लिये दूध का व्यपार भी| उनके 2 परिवार उस कब्रिस्तान में रहते थे| बचपन की भूतों की कहानी सुनने की आदत के कारण और माहौल भी कुछ कुछ ऐसा ही होने के कारण से कभी कभार मियाजी से कब्रिस्तान के बारे में गुफ्तगू हो ही जाती थी| मियाजी के अनुसार उनके पूरे परिवार को रात 9-9:30 के बाद बाहर निकलने की मनाही थी| एक बार उनका छोटा भाई गाँव से उनके पास आया हुआ था| एक रात वह लघुशंका निवारण के लिये निकला, ना जाने उस रात क्या हुआ शुबहा उसका बदन गरम तवे की भांती तप रहा था और बड़ी ही मुश्किल से उसके मुंह से शब्द निकल रहे थे यहाँ आकर मैने बड़ी गलती कर दी उससे भी बड़ी गलती रात को बाहर निकल कर कर दी| मिया जी ने अपने भाई को गाँव भेजा और व़हाँ पर कुछ दिनो बाद उसकी जीवन यात्रा भी समाप्त हो गयी| किन्तु ये नही मालूम हुआ की उस रात उसके साथ हुआ क्या था? (वैसे प्रचलित किस्से कहानियों में हमने सुना था मुसलमान भूत सबसे ज्यादा खतरनाक होते हैं, मतलब भूतों में धर्म की घुसपैठ है)

शेष लगातार भाग – 2



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