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साक्षात्कार .......

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आज घर में बहुत ही अच्छा खुशगवार माहौल था। जैसे कोई उत्सव हो, इन दिनों आस पास कोई त्यौहार तो था भी नहीं किन्तु आज का दिन किसी त्यौहार से भी कम नहीं था। इस गरीब के घर की बेटी सुशिल ने अपनी योगता से सरकारी नौकरी के लिए दी हुई परीक्षा पास की थी और उसी का परिणाम था जो उसको इंटरव्यू के लिए बुलाया गया था। ज्यादा ख़ुशी की बात ये थी की जिस पोस्ट के लिए सुशिल ने परीक्षा पास की थी वो सिर्फ एक ही पोस्ट थी और हजारों प्रत्याशियों में से सुशिल ने टॉप किया था। सुशिल के लिए तो ये अछि खबर थी ही साथ ही परिवार के लिए और गाँव के लिए भी गर्व का विषय था। गाँव की पहली लड़की थी सुशिल जिसने शुरू से ही शिक्षा के क्षेत्र में गाँव का नाम रोशन किया हुआ था और अब ये सरकारी नौकरी के लिए चयन। यदि सुशिल को सरकारी नौकरी मिलती है तो वह गाँव की पहली लड़की होगी जिसको सरकारी नौकरी मिलेगी। अभी दस दिन बाद था सुशिल का इंटरव्यू, लेकिन गाँव भर से बधाई और सलाह के लिए लोगो का ताँता लगा हुआ था। ज्यादातर लोगो की ये ही राय थी कि आज के समय में क़ाबलियत से आप मंजिल के दरवाज़े तक तो पहुच सकते हो किन्तु वहां पर महल का दरवाजा खोलने के लिए सिफारिश सबसे ज्यादा जरुरी चाबी है। सुशिल के पिता जी खुद एक मजदूर आदमी है जो कभी अपने परिवार को भर पेट रोटी नहीं दे सके, अब किसी बड़े आदमी के साथ जान-पहचान तो दूर की बात थी। भले ही उन्होंने बड़े बड़े लोगो की कोठियों के निर्माण के समय वहां पर मजदूरी की थी। कहाँ पर तो जिस दिन घर पर सुशिल का इंटरव्यू लैटर आया था तो ख़ुशी का माहौल था और कहाँ बीतते समय के साथ परेशानी का सबब बन चुका था। जहाँ पर आस होती है वहां पर राह तो निकल ही आती है। चर्चा का विषय बन चुके सुशिल के इंटरव्यू लेटर की खबर गाँव के ही दूसरे छौर पर रहने वाले सुन्दर के घर में भी पहुच गयी। सुन्दर भी सरकारी दफ्तर में चपड़ासी था। वो छुट्टी के दिन अपने घर आया हुआ था, तो बधाई देने के लिए सुशील के घर पहुच गया। चाय-पानी नाश्ता लेने के बाद सुन्दर ने सुशिल को उसका इंटरव्यू लेटर दिखने को कहा। गरीब को एक आस नजर आई सुन्दर के द्वारा उस इंटरव्यू लेटर देखने को मांगने में। क्यूंकि सुन्दर एक सरकारी नौकर था और उसकी बहुत जान-पहचान थी सरकारी दफ्तरों में। उसने गाँव वालों के बहुत से सरकारी काम निपटाए थे अपनी जान पहचान के बल पर। लैटर देख कर सुन्दर की आँखे चमक उट्ठी और चहेरा ऐसे खिल गया कैसे उसने बहुत बड़ा किला फ़तेह कर लिया हो। सुन्दर ने सुशिल के घर वालों के कानो में सुखद शब्द मिश्री के भांति घोल दिए, उसने कहा ये दफ्तर तो उसी बिल्डिंग में है जहाँ पर मेरा दफ्तर है। सुन्दर ने कहा जिस दिन इंटरव्यू हो उस दिन वो उसी दफ्तर के पास मिल जायेगा। सुन्दर अपने घर चला गया, उसके जाने के बाद घर में फिर से वैसा ही माहौल हो गया जैसा उस दिन था जिस दिन इंटरव्यू लेटर आया था। एक बार फिर से उम्मीद की किरण जगी थी सुशिल और उसके गरीब परिवार में।

निश्चित दिन सुशिल अपने पिता जी के साथ इंटरव्यू देने के लिए शहर गयी। जिस पोस्ट के लिए सुशिल इंटरव्यू देने आई थी उसके लिए अन्य दो पुरुष भी आये थे। सुशिल का उन दोनों से परिचय हुआ, दोनों पुरुष अपनी नियुक्ति के लिए आश्वस्त थे। ऐसा उनके हाव भाव से लग रहा था। कुछ ही समय बाद सुन्दर भी वहां पर आ गया। उसने कहा मैंने पता लगा लिया है जो अफसर इंटरव्यू लेंगे। जैसे ही अफसर आयेंगे में बहार ही तुम लोगो को मिलवा दूंगा। सुशिल के पिता को सुन्दर साक्षात् भगवन नजर आ रहा था, जो इतना कुछ कर रहा था। अब इंत����़ार की घडियाँ ख़त्म हुई और इंटरव्यू लेने वाली कमेटी पहुची। सुन्दर अपनी जुबान पर खरा उतरा और उसने बहार ही सुशिल का परिचय कमेटी मेंबर से करवा दिया। उनके अन्दर जाने के बाद सुन्दर ने बतलाया कि नतीजा आज ही सुना दिया जायेगा। इंटरव्यू शुरू हुआ, सुशिल का नंबर अंत में था। पहला प्रत्याशी काफी समय बाद बहार आया बाहर आया, उसके बाद दूसरा प्रत्याशी अन्दर गया वो भी काफी समय से अन्दर ही था। इस बीच सुशिल को बहुत घबराहट हो रही थी वो न जाने कितना पानी पी चुकी थी, ज्यादा पानी पीने के कारण उसको जोरो का शोच आ गया, वह बड़ी ही मुश्किल से प्रेशर को रोके हुए थी, इस चक्कर में कि कहीं उसके नाम की पुकार न हो जाये। लेकिन अब तो बाँध टूटने ही वाला था, वह पिताजी को कह जैसे ही निवृत्ति के लिए चली तभी दूसरा प्रत्याशी बाहर आ गया और सुशिल के नाम की पुकार हुई। मरती क्या न करती सुशिल लघु शंका को और रोकने का साहस समेट इंटरव्यू कमेटी के सामने चली गयी। अन्दर जाते ही उसने अन्दर बैठे तीनो लोगो को नमस्ते की, उन लोगो ने उसको बैठने की इशारा किया, सुशिल बैठ गयी और पहले प्रश्न का इंतजार किया लगभग पांच मिनिट बाद पहला प्रश्न आया और कुल मिलाकर तीन या चार प्रश्न ही आये सुशिल के सामने और कमेटी ने उसका इंटरव्यू पूरा कर बाय बोल दिया।

सुशिल शुक्रिया कह बहार निकली, उसको लगा जैसे वह कैद से बहार निकली हो, अब उसका दिमाग काम नहीं कर रहा था क्यूंकि उसको सबसे पहले लघु शंका से निवृति पानी थी। तो उसने बहार आते ही सबसे पहले वो ही किया। उसके बाद वो अपने पिता के पास आई। पिता ने उससे इंटरव्यू के बारे में ढेर सारे प्रश्न कर डाले, दूसरे प्रत्याशी भी सुशिल के पास आये और इंटरव्यू के बारे में बातचीत की। तभी सुन्दर भी आ गया, अभी सुन्दर ने ठीक से बातचीत शुरू भी नहीं की थी कि  उसे अन्दर बैठे कमेटी के लोगो ने बुलाया। सुन्दर जल्दी से अन्दर गया और लगभग आधे घंटे बाद बाहर आया, उसका चेहरा उतरा हुआ था। तभी अन्दर से संदेशा आया कि नतीजा दो दिन बाद सुनाया जायेगा …..

सुन्दर ने सुशिल के पिता से कहा वह भी आज गाँव चलेगा, दफ्तर में कह दिया है और कल की छुट्टी भी ले ली है। तीनो बस अड्डे पर पहुचे और गाँव के लिए बस पकड़ी। बस में बैठी बैठी सुशिल ने सोचा “वो दोनों प्रत्याशी उससे ज्यादा उपयुक्त थे, तभी तो कमेटी ने उनका इतना लम्बा इंटरव्यू लिया और मुझे सिर्फ 4-5 सवाल पूछ कर चलता कर दिया। ये नौकरी तो उनमे से किसी एक को मिलेगी।” इस बीच सुशिल के पिता ने सुन्दर से कहा “सुन्दर भाई लगता है ये नौकरी तो उस लड़के को मिल गयी जिसको दुसरे नंबर पर अन्दर बुलाया था, जब वह बाहर था तो मेरी उससे बात हुई थी, वह कह रहा था उसकी सिफारिश तो एक बड़े नेता ने कर रखी है, नियुक्ति पत्र पर तो उसका नाम दो दिन पहले ही लिखा जा चुका है, आज का खेल तो सिर्फ दिखावा है।” सुन्दर ने कहा “लगता तो मुझे भी ये ही है।” और ये कह कर खामौश हो गया, उसके चेहरे पर अभी भी शिकन थी, मन गलानी से भरा हुआ था। सुशिल के पिता ने फिर कहा “सुन्दर भाई तुमने तो अपना वादा पूरी तरह से निभाया है, लगता है बेटी सुशिल की ही किस्मत में ये नौकरी नहीं है, अभी और बहुत से दुःख भरे दिन देखने हैं हमको।” इधर सुशिल को भी लग रहा था कि उसके योग्यता में ही कमी थी तीनो प्रत्याशियों में वह ही सबसे अंत में थी और सबसे जल्दी उसका इंटरव्यू ख़त्म हो गया। और विषय से सम्बन्धित एक भी तो सवाल नहीं पूछा था उससे, एक सवाल तुम्हारा नाम क्या है? दूसरा सवाल घर में कौन कौन हैं? तीसरा सवाल पिताजी क्या करते हैं? और अंतिम सवाल क्या सुन्दर के गाँव की हो? ओर बाय कर बहार भेज दिया। भला किसी नौकरी के लिए सिर्फ ये ही सवाल पूछे जाते हैं और वो भी इतनी बड़ी नौकरी के लिए। पिताजी ठीक ही कह रहे हैं शायद ये नौकरी तो उस दूसरे लड़के को ही मिल गयी है जिसकी सिफारिश बड़े नेता जी ने कर रखी है, ये इंटरव्यू तो सिर्फ दिखावा है दिखावा। इसी उधेड़ बुन के बीच न जाने कब गाँव आ गया। सुन्दर अपने घर और सुशिल अपने घर पहुच गए। साँझ को घर में किसी ने खाना नहीं खाया, क्यूंकि बड़ी उम्मीद ले कर इस इंटरव्यू को देने गयी थी सुशिल, पुरे परिवार को उससे उम्मीद थी कि यह नौकरी तो उसको ही मिलेगी क्यूंकि पुरे गाँव में उससे ज्यादा हुशियार कोई नहीं था। लेकिन उन लोगो को क्या मालूम दुनिया सिर्फ गाँव तक सिमित नहीं है गाँव से बाहर भी बहुत बड़ी दुनिया है, उससे भी ज्यादा हुश्यार लोग भरे पड़े हैं इस दुनिया में। लेकिन इधर सुशिल को एक बात समझ नहीं आ रही थी कि इंटरव्यू का नतीजा तो आज ही सुनाना था किन्तु अभी दो दिन बाद नतीजा आना है, लेकिन वो ये बात क्यों सोच रही है, यह नौकरी तो उसको नहीं मिलनी क्यूंकि जिसका नाम इस नौकरी पर लिखा है वो तो तय हो चूका है।

सुबह सुशिल का पिता अपनी मजदूरी पर चला गया, पहले ही एक दिन की दिहाड़ी मरी गयी थी सुशिल के इंटरव्यू के कारण, एक दिन की दहाड़ी की कीमत एक मजदुर ही जान सकता है। सुशिल की माँ घर का चूल्हा जलाने के लिए इंधन (लकड़ियाँ) लेने मोहल्ले की औरतों के साथ जंगल चली गयी। उसके भाई बहन अपने स्कूल में। इस गरीब मजदुर परिवार की जिन्दगी फिर से पुराने दिनों की भांति चल पड़ी। सिर्फ बिता दिन ही विशेष था इस परिवार के लिए, उस दिन एक छोटी सी उम्मीद जगी थी इस परिवार के दिन बदलने की, किन्तु गरीब के दिन सिर्फ कहानियों में ही बदलते हैं हकीकत में नहीं।

दिन का समय था सुशिल घर में अकेली थी, तभी बाहर से आवाज आई – “घर मेंकोई है क्या?” अरे ये तो सुन्दर की आवाज है, सुशिल ने आवाज को पहचाना और आ कर दरवाजा खोल तो सच ही मैं सुन्दर ही था दरवाजे पर। अरे सुन्दर जी आप आओ अन्दर आजो। सुन्दर अंदर आ कर चारपाई पर बैठ गया, इस बिच सुशिल चाय बना लायी। चाय की चुस्कियां लेते हुए इधर उधर की बातें होने लगी तभी बिच में सुशिल ने कहा सुन्दर जी एक बात समझ नहीं आई? इंटरव्यू का नतीजा तो कल ही सुना दिया जाना था किन्तु ये दो दिन वाला चक्कर क्या है? सुन्दर शायद इसी सवाल का इंतजार कर रहा था। उसे लगा इस सवाल ने उसके दिलोदिमाग से जैसे कोई बहुत बड़ा पत्थर उतर फैंका हो। उसने सुशिल को दफ्तर के अन्दर हुई वार्तालाप का ब्यौरा कुछ इस प्रकार से – सुनाया

मैं जब अन्दर गया तो वहां पर सिर्फ एक ही अफसर बैठा था, जो मुझे सबसे ज्यादा चाहता है। उनको अकेले देख मुझे तसल्ली हुई कि अब तो साहब को किसी न किसी तरह तुम्हारी नौकरी के लिये मना ही लूँगा। वह मेरे किसी भी काम को मना नहीं करता। उन तीनो लोगो में से वो ही सबसे इमानदार है, गरीब की मदद ले लिए वह हमेशा आगे रहता है। मेरे बातचीत शुरू करने से पहले ही वह बोल -

अफसर – “सुन्दर ये लड़की सुशिल तुम्हारी क्या लगती है?”

सुन्दर – “साहब! हमारे गाँव की है, बहुत ही गरीब घर से है, बड़ी ही मुश्किल से इसके पिता ने इसकी पढाई पूरी करवाई है, गाँव भर में क्या स्त्री क्या पुरुष सबसे ज्यादा होश्यार है।”

अफसर – “अरे ये तुम्हारे रिश्ते में क्या लगती है?”

सुन्दर – “साहब गाँव की बेटी है तो हमारी भी बेटी लगती है।”

अफसर – “खून का रिश्ता है क्या?”

सुन्दर – “नहीं”

अफसर – “देखो सुन्दर मैं झूठ नहीं बोलूँगा, इसका चयन नहीं हो सकता, इससे पहले जो लड़का आया था, उसकी शिफारिश नेता जी ने कर रखी है। देखो ये रहा नियुक्ति पत्र।”

सुन्दर – “साहब इस पर तो नाम अभी लिखा ही नहीं है, और उन दोनों अफसरों के हस्ताक्षर इस पर दर्ज हैं।”

अफसर – “हाँ! उन दोनों को कुछ काम था वो हस्ताक्षर कर चले गए। और बाकि कार्यवाही करने के लिए मुझे कह गए हैं।”

सुन्दर – “तो साहब फिर देरी किस बात की है?”

अफसर – “सुन्दर! तुम जानते तो जानते हो मैं तुम्हारे किसी जायज काम को मना नहीं करता। और इस काम से तो एक गरीब घर की पुरे जीवन भर की रोटी जुडी है, इसको कैसे मना कर सकता हूँ?”

सुन्दर – “वो तो है ही साहब जी, मैं भी तो आपके हर काम को करता हूँ चाहे जैसा भी हो।”

अफसर – “तभी तो एक नेक काम का मौका हाथ लगा है, तो तुम्हे बुला लिया।”

सुन्दर – “जी ये तो आपका बड़प्पन है, जो मुझ अदना से कर्मचारी को इस लायक समझा।”

अफसर – “अरे नहीं तुम छोटे नहीं हो और आदमी आदमी में कुछ छोटा-बड़ा, उच्च-नीच नहीं होता, बस आदमी को आदमी के काम आना चाहिए।”

सुन्दर – “साहब आपके विचार कितने अच्छे हैं, सभी लोग ऐसे हो जाये तो समाज से भेदभाव ही मिट जाए।”

अफसर – “हाँ ये भेदभाव ही मिटने के लिए तुम्हे बुलाया है।” देखो ये नियुक्ति पत्र दो दिन तक खाली रहेगा, उसके बाद ही किसी का नाम इस पर लिखा जायेगा। तुम चाहो तो सुशिल का नाम इस पर लिखा जा सकता है।”

सुन्दर – “साहब किसी गरीब का भला हो ये तो अच्छा ही है, किन्तु वो लोग बड़े ही निर्धन हैं, उनकी और मेरी औकात इतनी नहीं की रूपये पैसे किसी प्रकार के उपहार की मदद कर सकें।”

अफसर – “अरे सुन्दर! धन किसने माँगा है? और गरीब तो सुशिल का परिवार है धन दौलत से, सुशिल नहीं। उसके पास तो वो दौलत है, जो आजतक मैंने जिन्दगी में किसी औरत के पास नहीं देखि। बड़ी फुर्सत में ओवर टाइम पर ओवर टाइम लगा कर बनाया है भगवन ने उसे। तुम तो सिर्फ संदेशा दे दो सुशिल को यदि वो चाहे तो एक बार अकेले में इंटरव्यू दे दे, हाथो हाथ उसका नियुक्ति पत्र दे दूंगा।”

ये सुन कर मेरे खून खौल गया, हमारे गाँव के बेटी को कोई इस नजर से देखे, दिल ने तो चाहा साले को उठा कर पटक दे, बोटी बोटी कर डाल यहीं पर, किन्तु दिमाग ने हाथ बांध दिए, ऐसा करने से मेरा परिवार मिटटी में  मिल जायेगा। मैं तो अपने विश्वास की धजियाँ उड़वा कर, गलानी से शर्मिंदा हो दफ्तर से निकलने लगा तो अफसर ने नियुक्ति पत्र की फोटोकापी मेरे हाथ में थमा दी, देखो ये देखो ……..

अभी सुन्दर अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाया था कि सुशिल आग बबूला हो गयी। सैकड़ों सवालों के गोले उसने सुन्दर पर दाग दिए, हजारों गालियों की बौछार उस अफसर पर कर डाली।

एक नारी का अपमान सह कैसे लिया आपने? उसने ऐसा कहा तो सुनते ही तुम्हारे कान गल क्यूँ नहीं गए? तुम्हारे पैरों के तले धरती फट क्यों ना गयी? सच है नारी का इस समाज में कोई रक्षक नहीं है सब तरफ भक्षक ही भक्षक हैं, और मैं तो ठहरी गाँव के एक गरीब मजदूर की बेटी। उस नारी भक्षक, नरक भोगी की जबान कट क्यों ना गयी। अभी सुशिल अपने गुस्से से आग बबूला हो गलियों के अग्नि बाण बरसाए जा रही थी, इस बीच सुन्दर मौका पा वहां से खिसक लिया। जब सुशिल थोड़ी शांत हुई तो उसने सुन्दर को वहां नहीं पाया, बाहर निकल गली तक भी देख आई थी वो, फिर वापस अन्दर आ कुछ खोजने लगी। वहां सुशिल के घर से निकल सुन्दर और ज्यादा अत्म्गालिनी से दब गया था। अफसर का प्रस्ताव और सुशिल के सवाल उसके दिमाग में बार बार हमला कर रहे थे। इन दोनों के बीच वह अपने को ठगा महसूस कर रहा था, इन दोनों के स्वार्थ के बीच उसकी भूमिका क्या थी। वह गलत कहाँ था, क्या वो अफसर को उसी वक्त तोड़ फोड़ कर अपने परिवार का भविष्य को अंधकार में धकेल देता, ये कहाँ की समझदारी है? या अफसर का प्रस्ताव सुशिल को न दे कर सुशिल और उसके परिवार के भविष्य का निर्णय खुद ही कर देता। और कल से आज तक जो भी हुआ है वो अभी सिर्फ तीन जनों के ही बीच है - अफसर, सुन्दर और सुशिल। यदि कल वह कुछ बखेड़ा खड़ा कर देता तो हो सकता था ये बात तीन लोगो के बीच न रह ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाती। इस उधेड़बुन में उसका घर आ गया, अन्दर जा उसने ढेर सारा पानी पिया। थोडा सा दिमाग शांत हुआ तो उसने तय किया की कल दफ्तर जाते ही अपनी पहुच का लाभ उठाते हुए अपना तबादला करवा लेगा। एक तरह से उसने अपने को उस राह से ही अलग करने का रास्ता बनाने की सोच ली थी, भविष्य में तो उस अफसर से सामना नहीं होगा। रही बात सुशिल की तो गाँव में कब सामना हो या न हो वो अलग बात है। फिर भी मन में एक डर तो था ही, कही सुशिल इस बात को गाँव भर में फैला न दे, किन्तु आश्वस्त ही था कि एक औरत अपनी इज्जत खुद नहीं उड़ा सकती।

उधर सुशिल जो खोज रही थी उसको वह मिल गया, मतलब वो नियुक्ति पत्र की फोटोकापी। बड़े इत्मिनान से बैठ उसने उस पत्र को पढ़ा, बार बार और बार बार पढ़ा। उस साँझ सुशिल ने ठीक से खाना नहीं खाया। बिस्तर में भी जल्दी चली गयी। ऐसा नहीं है इससे पहले किसी ने उसकी और गलत नज़र से नहीं देखा हो, बहुत मौके थे बहुत लोगो ने बहुत कुछ करने की कौशिश की थी, लेकिन सुशिल ने एक साहसी बहादुर और निडर, दबंग महिला की भांति उनको मुह तोड़ जवाब दिया था, ये ही कारण था कि गाँव के भी मनचले लड़के उसको बहन स्वीकार करते थे। एक गरीब अनपढ़ मजदुर की लड़की में इतनी हिम्मत भुत ही कम देखने को मिलती है। किन्तु आज परिस्थिति कुछ अलग थी जिसके कारण उसे ठीक से नींद नहीं आ रही थी, दिमाग में बहुत उथल पुथल थी, दो राहों पर दिमाग जा रहा था, एक राह सब बर्बाद कर देती, लेकिन बर्बाद होने के लिए उनके पास है ही क्या, गरीब मजदुर के घर में अभावों का जीवन बिताते बिताते सारा समय गुजर है, आगे इससे ज्यादा क्या बर्बाद होगा, परिवार इस महंगाई के ज़माने में ज्यादा और ज्यादा मुश्किलों का सामना करने का अदि हो जायेगा, बीमार को दावा नहीं शारीर से मुक्ति मिलेगी और होगा क्या या इससे भी आगे भगवान् कुछ दिखा सकता है? या फिर दूसरा रास्ता जहाँ जाना क्या है? इसी द्वन्द में न जाने कब दिमाग की बैटरी ख़त्म हो गयी और वह सो गयी। अगले दिन मुह अँधेरे घर में खटर पटर की आवाज से सुशिल के पिता की आँख खुल गयी, उठ कर देखा तो सुशिल नहाधो तैयार हो रही थी, पिता ने पूछा – “बेटी सुशिल! इतनी सुबह तैयार हो कहाँ जाने की तैयारी है?” सुशिल ने कहा – “पिता जी शहर जा रही हूँ।” “तो ठीक है मैं भी जल्दी से तैयार हो लेता हूँ, में भी तुम्हारे साथ चलता हूँ।” सुशिल के पिता ने कहा। सुशिल ने कहा – “नहीं पिता जी! आज आपका काम नहीं है वहां पर, सिर्फ मेरे जाने से काम चल जायेगा।” बेटी द्वारा आश्वाशन देने के बाद बूढ़ा पिता अपने नित्य कर्मो में जुट गया और सुशिल अपनी मंजिल की ओर निकली। दिन में दिहाड़ी पर दोपहर को सुशिल का पिता जब खाना खाने बैठा तो साथ की दुकान पर टेलिविज़न पर अचानक ब्रेकिंग न्यूज़ शहर में एक अफसर ने एक महिला के साथ अभद्र व्यवहार किया, महिला ने पुलिस में इसकी शिकायत की है, पुलिस ने मामला दर्ज कर चम्बिर शुरू कर दी। किन्तु न्यूज़ में महिला और अफसर की तस्वीर नहीं दिखाई गयी थी। जवान बेटी के बूढ़े बाप का ह्रदय घोर शंकाओं से घिर गया, उसकी बेटी भी आज शहर में गयी है, इस समाज में महिला कही भी सुरक्षित नहीं है। इसी शंका के चलते वह खाना बीच में ही छोड़ आधी दिहाड़ी लेकर ही घर लौट आया। उसको घबराहट हो रही थी कही वो अनहोनी घटना उसकी बेटी के ही साथ तो घटित नहीं हो गयी, इसी चिंता में वो आधा हुआ जा रहा था। शंका आशंका में ही साँझ ढलने लगी और उसको चिंता ज्यादा और ज्यादा बढ़ने लगी

साँझ को सुशिल ख़ुशी से झूमती घर में घर में घुसी भाई बहन को मिठाई का डिब्बा देते हुए माँ के गले से जोरो से लिपट गयी और चहकने लगी – “माँ अपना सामान बांध लो हमें सुबह शहर जाना है, मैंने परसों जो इंटरव्यू दिया था उसमे मैं पास हो गयी हूँ, मैंने अपने से ज्यादा होश्यार दो पुरुषो को पछाड़ दिया है, आज मेरी नौकरी लग गयी है।” सारा का सारा परिवार ख़ुशी से झूम गया और भगवन का शुक्रिया अदा कर रहा था, लाख लाख बधाई दे रहा था। इधर सुशिल के दिल के बहुत गहरे कौने में दबी सी एक छवि सुन्दर की उभर कर  के लिए मिट गयी ………

अगले गाँव भर में सुशिल की नौकरी की खबर जंगल की आग की भांति फ़ैल गयी, जिसे देखो वो बधाई देने उसके घर धमक रहा था, सुशिल के गुणगान गा रहा था – “सुशिल बड़ी ही होनहार, लायक, काबिल, मेहनती लड़की है, इसको तो इसकी मेहनत का फल मिलना ही था।” सुशिल का परिवार शहर जाने की तैयारी भी कर रहा था। गाँव भर में चर्चा थी  अब इस गरीब परिवार के दिन फिर गए हैं, गाँव वाले गीत गुनगुना रहे थे - “इनके तो दुःख भरे दिन बीते रे भैया अब सुख आयो रे, अब सुख यो रे …….. । बधाई देने वालो में सुन्दर का परिवार भी था किन्तु उनके साथ सुन्दर नहीं था ……..



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