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धरती पर भगवान् है वो .........

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वह बहुत ही बड़ा आयुर्वेदाचारी था। उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। इलाके के ही नहीं बल्कि दूर-दूर तक के समस्त लोगो में उसके आर्युवेद ज्ञान का चर्चा था। बहुत सी लाइलाज बिमारियों को वह चुटकियों में ठीक कर देता था। धरती पर साक्षात् भगवान् है वो ……… ऐसा लोगो का मानना है। किन्तु उसके बारे में ये भी मसहूर था कि उससे मिलना बहुत कठिन कर्म है।
रमेश और अनुराग बहुत ही गहरे मित्र हैं, रमेश एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखता है। वह सादा जीवन उच्च विचार वाली निति पर चलने वाला स्वाभिमानी युवक है। रमेश धन से तो गरीब था किन्तु मित्तरता के मामले में वह बहुत धनी था। बड़े-बड़े लोगो तक उसकी पहुंच थी। लेकिन किसी को बहुत ज्यादा मज़बूरी में भी तंग नहीं करता था। इसके उलट अनुराग के परिवार की वित्तीय स्तिथि रमेश से कुछ अच्छी है। वह आधुनिक समय में जीने वाला और फैशन की दौड़ से कदमताल करता हुआ अपना जीवन जीने वाला युवक है।  अनुराग किसी काम की ठान ले तो उसको किसी भी हाल में पूरा करता है चाहे उसके लिए उसको “साम दाम दंड भेद” किसी भी नीति को अपनाना पड़े। कुल मिला कर दोनों की स्तिथि “पूरब और पस्चिम” वाली थी। अनुराग रमेश के विचारो का कायल था और रमेश अनुराग की आधुनिकता से घायल था, फिर भी बहुत गहरे मित्र और एक दुसरे के सच्चे साथी थे।
एक बार रमेश की बहन बहुत बीमार हो गयी। रमेश ने अपनी औकात के अनुसार बहुत से डाक्टरों को दिखाया, किन्तु बहन की सेहत में कुछ सुधार नहीं हुआ। एक दिन वह अपने कार्यस्थल पर विचारों में गुम था, तभी अनुराग की आवाज ने उसको वर्तमान में ला पटका।
अनुराग – “अरे रमेश! कहाँ गुम हो भाई?”
रमेश – “कुछ नहीं, बस यूँ ही।”
अनुराग – “कोई तो गम है जो हमसे छुपा है”
रमेश – “अरे नहीं, बस बहन की बीमारी के बारे में ही सोच रहा था।”
अनुराग – “क्या हुआ अभी तक ठीक नहीं हुई क्या वो?”
रमेश – “कहाँ भाई, न जाने कितने डाक्टरों को दिखा चुका हूँ, लेकिन रत्ती भर भी फर्क नहीं लग रहा।”
अनुराग – “तू आर्युवेदाचारी को क्यों नहीं दिखता?”
रमेश – “अरे नहीं भाई वो बहुत बड़ा और उससे भी अधिक महंगा है, मेरी पहुँच से बहुत दूर है।”
अनुराग – “थोडा अपनी सोच को बदल रमेश, अब तक कितना रुपया खर्च कर चुका है बहन पर?”
रमेश – “जिसने जहाँ कहा वहां गया हूँ।”
अनुराग – “मुझे लगता है थोडा थोडा कर तूने बहुत खर्च कर दिया, यदि एक बार ही में जुगाड़ कर अच्छा इलाज करवाता तो इतना परेशान नहीं होता और बहन अब तक ठीक भी हो चुकी होती।”
(रमेश की समझ में कुछ आया उसने अनुराग के बातों से सहमती जताई और दिमाग में सारा का सारा हिसाब लगाया तो वह अब तक अपने को ठगा सा पाता है, सच ही तो कह रहा है अनुराग जितना खर्च थोडा थोडा कर किया है वह तो बहुत खर्च हो चूका है। तभी तो बुजर्गों ने भी कहा है “महंगा रोये एक बार सस्ता रोये बार बार”। रमेश ने निश्चय किया कि अब वह अपनी बहन का इलाज आयुर्वेदाचारी जी से ही करवाएगा।)
रमेश – “अनुराग किसी तरह उनसे मुलाकात का जुगाड़ कर भाई।”
अनुराग – “रमेश! वह मिलना बहुत मुश्किल है। बड़े बड़े लोगो के लिए ही बुक रहता है, फिर भी “जहाँ चाह वह��ं राह”, कोई न कोई रास्ता निकालते हैं उनसे मिलने का।”
(अनुराग ने रमेश से विदा ली, रमेश भी अपने काम पर लग गया, अब उसका मन कुछ हल्का हो गया था, एक सच्चे मित्र ने उसका थोड��� सा बोझ जो हल्का कर दिया था। आज शायद वह बहुत दिनों बाद थोडा सा सकून महसूस कर रहा था। उसे उम्मीद जागी थी �����ी बहन का इला��� अब अच्छे से हो सकेगा और वह ठीक हो जाएगी, इतने बड़े आयुर्वेदाचारी से इलाज करवाने की पहल जो हुई है, दिमाग में किसी बात या काम को पूरा करने की ठान ली जाये तो उसकी शुरुआत तो हो जी जाती है, फिर उसके लिए प्रयास करने से रस्ते भी अपने आप ही निकलते आते हैं। रमेश ने रुपयों का और अनुराग ने आयुर्वेदाचारी से मिलने का समय लेने के प्रयास शुरू किये। लगभग एक महीने बाद अनुराग इस प्रयास में सफल हुआ और आयुर्वेदाचारी से उसके भी एक महीने बाद मिलने का समय मिला। ये खुशखबरी देने अनुराग रमेश के घर पंहुचा।)
रमेश – “अरे अनुराग आओ मित्र आओ, कैसे हो?”
अनुराग – “ख़ुशी की खबर है, बाद में बतलाता हूँ पहले बताओ बहनजी कैसी है?”
रमेश – “सब बताता हूँ पहले अन्दर आ कर पानी-वानी तो पी लो।”
(चाय पानी लेने के बाद दोनों मित्र शुरू हो गए।)
अनुराग – “अरे रमेश बहुत ही मुश्किल से समय मिला है साले का (आयुर्वेदाचारी), बहुत बड़ी तोप है, यदि इतनी खुशामद भगवन की कर ले तो एक बार तो वह भी प्रकट हो जाये। पूरा एक महिना हो गया और अब भी एक महीने बाद का समय मिला है।”
रमेश – “मुझे भी पैसे का इंतजाम करने में बहुत पापड़ बेलने पड़े हैं, उन लोगो के आगे हाथ फलाये है जो गरीब को इन्सान न समझ सिर्फ गोश्त का चलता फिरता पुतला समझते हैं। चलो कोई नहीं, समय तो मिल गया ना, अब अपनी बहन का इलाज भी अछे से हो जायेगा और वो ठीक हो जाएगी।”
अनुराग – “हां यार ठीक कह रहा है, मुझे भी ऐसे-ऐसे लोगो की सिफारिश की सीढ़ी जोड़नी पड़ी है जो अब मुझसे कई गुना फायदा उठावेंगे, लेकिन एक ख़ुशी है की अपनी बहन का इलाज एक नामी-गिरामी आयुर्वेदाचारी के हाथों होगा, और वह बिलकुल ठीक हो जाएगी।”
रमेश – “हां उम्मीद पर दुनिया कायम है।”
(तय समय पर रमेश, अनुराग, रमेश की बहन माँ और पिताजी, मुह अँधेरे अपने घर से निकले और पांच छह घंटे का लम्बा सफ़र तय कर आयुर्वेदाचारी के यहाँ पहुचे। अनुराग के मन में एक अलग ही ख़ुशी थी आज, अपने समय की एक बहुत बड़ी हस्ती से मिलाने वाला था वह, जो इस समय धरती पर किसी भगवान् से कम नहीं था। जिससे मिलने के लिए उसको महीने भर की मेहनत और फिर एक महीने का इंतजार करना पड़ा था। भले ही माध्यम रमेश की बहन की बीमारी बनी थी, फिर भी वह अपनी अलग ही पहचान चाह रहा था आयुर्वेदाचारी जी के मन पर, इसीलिए उसने अपना परिधान भी अलग ही रखा था आज। फ्रेंच कट ढाढ़ी और  पठानी सूट में बड़ा ही सुन्दर लग रहा था वह। कद काठी से भी वह किसी पठान से कम नहीं था। अनुराग आज अपने आप ही में अलग लग रहा था। गाडी से उतर कर वो लोग आयुर्वेदाचारी के महलनुमा कोठी पर पहुचे, दरबान ने दरवाजे पर ही उनकी पूरी जन्मपत्री जाँच ली और अन्दर प्रतीक्षालय में बैठने को कहा। उस कमरे की सजावट-सज्जा और सामान को देख सब दंग थे, वहां बैठने पर उनको लगा सचमुच स्वर्ग में आ गए हो, अपनी सारी की सारि थकान को भूल चुके थे वो लोग, दीवारों पर भगवानो के छविचित्र के साथ साथ सुंगधित वातावरण था उस कमरे में और साथ ही साथ मधुर मधुर भक्ति संगीत बज रहा था, बड़ा ही सकारात्मक शक्तियों वाला कमरा था वह। इस बीच कब इंतजार के लगभग दो घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चला किसी ने पानी के लिए पूछा या नहीं ये भी नहीं मालूम पड़ा उनको, तभी एक आवाज ने उनकी मन्त्रमौन को तोडा – “चलिए आपको अन्दर बुलाया है।” सभी उस शख्स के पीछे हो लिए जो उनको बुलाने आया था। सबने एक एक कर उस कमरे में प्रवेश किया, उस कमरे का वातावरण और भी अद्भुत था, पिछले कमरे से ज्यादा भक्तिमय, शक्तिमय और ऊर्जावान था ये कमरा। सामने एक बड़ा सा ऊँचा आसन था जिस पर आयुर्वेदाचारी जी विराजमान थे, उनके चेहरे पर एक अलग ही तेज उमड़ रहा था, वह उस आसन पर विराजमान ऐसा लग रहा था जैसे कोई देवता विराजमान हो। उसके साथ में ही एक छोटी सी स्टूलनुमा गद्दी थी, जिस पर शायद पीड़ित को बैठना होता था, आसन के सामने निचे बैठने के लिए कुछ गद्दिया लगी हुई थी। सबसे आगे रमेश और सबसे पीछे अनुराग था। जैसे ही उन लोगो ने गद्दियों पर बैठने के लिए अपने घुटने मोड़े एक कड़क आवाज आई, ये आवाज आयुर्वेदाचारी जी की थी।)
आयुर्वेदाचारी – “बाहर निकलो यहाँ से ….. निकलो …… निकलो ….”
(जैसे किसी कुत्ते को दुत्कारा जाता है ऐसा बर्ताव किया आयुर्वेदाचारी ने उनके साथ। सभी किसी तरह अपने को गिरने से संभाल कर बाहर निकले। सभी अपने को बहुत लज्जित अनुभव कर रहे थे, जैसे कोई दलित मंदिर में घुस गया हो और पंडित ने उसको प्रताड़ित कर उनकी आत्मा पर चोट पहुचाई हो। रमेश गरीब भले ही था लेकिन स्वाभिमानी भी बहुत था, वह अपने को बहुत लज्जित अनुभव ���र रहा था, वह तुरंत ही इस जगह को छोड़ देना चाह रहा था लेकिन अनुराग ने अपने स्वभाव के अनुरूप बड़ी मुश्किल से हाथ आये इ���� मौके को नहीं छोड़ना चाह रहा था, बहार निकलकर उसने तुरंत उस दूत से संपर्क किया जिसने आयुर्वेदाचारी जी से मिलवाने का प्रबंध किया था, अभी अनु��ाग को फोन काटे पांच मिनिट भी नहीं हुए थे कि भीतर से दुबारा बुलावा आ गया। अनुराग ने रमेश से अनुग्रह किया।)
अनुराग – “रमेश! चलो अन्दर चलते हैं अब आयुर्वेदाचारी जी हमें पहचान गए है।”
रमेश – “नहीं अनुराग! मैं ऐसे व्यक्ति से नहीं मिलना चाहता जो सामने वाले की पहचान जाने बिना ही अपना फैसला लेता हो।”
अनुराग – “अरे दोस्त! कोई बात नहीं ग़लतफ़हमी में कुछ भी हो जाता है, उसका बुरा नहीं मानना चाहिए।”
रमेश – “ग़लतफ़हमी, कैसी ग़लतफ़हमी अनुराग? क्या हम इनके पास बिना बुलाये आये थे, कोई चोर उठाईगिरे तो नहीं हैं हम। कुछ इंसानियत भी होती है, इलाज नहीं करना था तो ना करता लेकिन कम से कम हमारा परिचय जान लेने के बाद ही मना करता।”
अनुराग – “गुस्सा थूक दो भाई …… हमें अपनी बहन का इलाज करवाना है …… गरज़ हमारी अपनी है।”
रमेश – “नहीं अपमान के सामने गरज़ वरज़ सब भाड़ में जाये। कल को ये मर गया तो क्या आयुर्वेद ख़त्म हो जायेगा, क्या लोगो का आयुर्वेद से इलाज नहीं होगा या कोई ओर इतना अच्छा इलाज नहीं कर सकता, जहाँ पर ये नहीं है क्या वहां पर मरीज ठीक नहीं होते ….. “
अनुराग – “गुस्सा छोड़ दे भाई ….. “
रमेश – “मैं गुस्सा नहीं हूँ, ये मेरे अन्दर का स्वाभिमान है ……. एक से और लाख से मैं अब इसके दर्शन नहीं करना चाहता।”
अनुराग – “ठीक है तुम नहीं जाना चाहते तो न सही हम ही मिलकर आते हैं।”
(अनुराग और बाकी सब अन्दर चले गए। रमेश वहां से निकल आया वहां पर उसका दम घुट रहा था, वह विचारों में डूबा जा रहा था – “इतनी बड़ी महलनुमा कोठी अन्दर का शांत, सुमधुर, भक्तिमय वातावरण और उसमे रहने वाला उसका मालिक इतना अ-मानुसिक व्यवहार वाला। छी है ऐसे लोगो पर…… अपने को बड़ा आयुर्वेदाचारी बनता है, अरे बनता क्या है लोगों ने बना रखा है …. किसी ने ठीक ही कहा है “दूर के ढोल सुहाने होते हैं” उनकी मधुरता का तो पता तभी लगता है जब उनके पास जाना होता है। क्या इलाज करता होगा ये जब इसकी वाणी में ही मधुरता नहीं है, लेकिन फिर भी लोगों की बीमारी ठीक होती हैं, ठीक होंगी भी क्यों नहीं इतना महंगा जो है। सिर्फ अमीरजादे ही इलाज करवा सकते हैं ऐसो के पास, उनको वहम के सिवा कोई बीमारी तो होती नहीं, फिर ज्यादा पैसा ऐठना आना चाहिए वो कला तो इसमें होगी ही नहीं होती तो इतना विशाल घर नहीं बना सकता था। आज पता चल गया भगवान् भी अन्यायकारी है, पहले होता होगा “भगवान् के घर देर है अंधेर नहीं” किन्तु आज के वक्त में तो “भगवान् के घर देर नहीं अंधेर ही अंधेर है”। रमेश विचारों में ही खोया हुआ था की तभी अनुराग और सब लोग बहार आ गए)
अनुराग – “अरे यार ये तो बहुत गलत फहमी हो गयी आयुर्वेदाचारी जी को ………. वो ठहरे कट्टर धार्मिक ……… “
(रमेश इस आयुर्वेदाचारी के विषय में कुछ बात नहीं करना चाहता था। किन्तु अनुराग था की बो������ा ही चला जा रहा था।)
अनुराग – “……. मेरी पोशाक से भ्रमित हो गये थे वो, मेरी पठानी ड्रेस और उस पर फ्रेंचकट देख उन्होंने मुझे मुसलमान समझ लिया था। तभी उन्होंने हमारे साथ इतना रुखा व्यवहार किया। लेकिन एक बात तो है साले को ����नी कल�� पर बड़ी पकड़ है एक ही झटके मे��� बहन जी का मर्ज बतला दिया और बीस हज़ार रूपये का बिल बना कर सप्ताह भर की दवा देकर बोल अब दुबारा आने की जरुरत नहीं पड़ेगी।”
(एक सप्ताह बाद साँझ को अनुराग रमेश के घर पंहुचा, देख कर बहुत खुश हुआ कि बहन जी की तबियत में अब दिन रात का फर्क था, वह पहले से बहुत बेहतर थी, सप्ताह भर पहले तो उसकी आवाज भी नहीं निकल रही थी, लेकिन इस बार पानी के गिलास वही लेकर आई)
बहन जी – “नमस्ते अनुराग भैया जी! कैसे हो ?”
अनुराग – “मैं तो ठीक हूँ तुम बतलाओ अब कैसा अनुभव कर रही हो?”
बहन जी – “आप देख ही रहे हो, पहले तो बोलती बंद थी और अब …… हा…. हा…..।”
अनुराग – “ये तो आयुर्वेदाचारी जी का ही कमाल है ….. “
रमेश – “मै नहीं मानता, जिस आदमी को इन्सान की कद्र नहीं उसके अन्दर कोई कमाल नहीं होता, मेरा मानना है हमारे आयुर्वेद में ही इतनी ताकत है, यदि सही दवा दी जाये तो …….”
अनुराग – ” बहन जी! अब तो खत्म हो चुकी होगी ….?”
बहन जी – “हाँ ….. लेकिन अब फिर से दवा लेने जाना होगा ….. “
(अनुराग ने प्रश्न वाचक द्रष्टि से रमेश की तरफ देखा, रमेश अभी भी पिछली घटना से खफा था, उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी ……..)

वह बहुत ही बड़ा आयुर्वेदाचारी था। उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। इलाके के ही नहीं बल्कि दूर-दूर तक के समस्त लोगो में उसके आर्युवेद ज्ञान का चर्चा था। बहुत सी लाइलाज बिमारियों को वह चुटकियों में ठीक कर देता था। धरती पर साक्षात् भगवान् है वो ……… ऐसा लोगो का मानना है। किन्तु उसके बारे में ये भी मसहूर था कि उससे मिलना बहुत कठिन कर्म है।

रमेश और अनुराग बहुत ही गहरे मित्र हैं, रमेश एक गरीब परिवार से ताल्लुक रखता है। वह सादा जीवन उच्च विचार वाली निति पर चलने वाला स्वाभिमानी युवक है। रमेश धन से तो गरीब था किन्तु मित्तरता के मामले में वह बहुत धनी था। बड़े-बड़े लोगो तक उसकी पहुंच थी। लेकिन किसी को बहुत ज्यादा मज़बूरी में भी तंग नहीं करता था। इसके उलट अनुराग के परिवार की वित्तीय स्तिथि रमेश से कुछ अच्छी है। वह आधुनिक समय में जीने वाला और फैशन की दौड़ से कदमताल करता हुआ अपना जीवन जीने वाला युवक है।  अनुराग किसी काम की ठान ले तो उसको किसी भी हाल में पूरा करता है चाहे उसके लिए उसको “साम दाम दंड भेद” किसी भी नीति को अपनाना पड़े। कुल मिला कर दोनों की स्तिथि “पूरब और पस्चिम” वाली थी। अनुराग रमेश के विचारो का कायल था और रमेश अनुराग की आधुनिकता से घायल था, फिर भी बहुत गहरे मित्र और एक दुसरे के सच्चे साथी थे।

एक बार रमेश की बहन बहुत बीमार हो गयी। रमेश ने अपनी औकात के अनुसार बहुत से डाक्टरों को दिखाया, किन्तु बहन की सेहत में कुछ सुधार नहीं हुआ। एक दिन वह अपने कार्यस्थल पर विचारों में गुम था, तभी अनुराग की आवाज ने उसको वर्तमान में ला पटका।

अनुराग – “अरे रमेश! कहाँ गुम हो भाई?”

रमेश – “कुछ नहीं, बस यूँ ही।”

अनुराग – “कोई तो गम है जो हमसे छुपा है”

रमेश – “अरे नहीं, बस बहन की बीमारी के बारे में ही सोच रहा था।”

अनुराग – “क्या हुआ अभी तक ठीक नहीं हुई क्या वो?”

रमेश – “कहाँ भाई, न जाने कितने डाक्टरों को दिखा चुका हूँ, लेकिन रत्ती भर भी फर्क नहीं लग रहा।”

अनुराग – “तू आर्युवेदाचारी को क्यों नहीं दिखता?”

रमेश – “अरे नहीं भाई वो बहुत बड़ा और उससे भी अधिक महंगा है, मेरी पहुँच से बहुत दूर है।”

अनुराग – “थोडा अपनी सोच को बदल रमेश, अब तक कितना रुपया खर्च कर चुका है बहन पर?”

रमेश – “जिसने जहाँ कहा वहां गया हूँ।”

अनुराग – “मुझे लगता है थोडा थोडा कर तूने बहुत खर्च कर दिया, यदि एक बार ही में जुगाड़ कर अच्छा इलाज करवाता तो इतना परेशान नहीं होता और बहन अब तक ठीक भी हो चुकी होती।”

(रमेश की समझ में कुछ आया उसने अनुराग के बातों से सहमती जताई और दिमाग में सारा का सारा हिसाब लगाया तो वह अब तक अपने को ठगा सा पाता है, सच ही तो कह रहा है अनुराग जितना खर्च थोडा थोडा कर किया है वह तो बहुत खर्च हो चूका है। तभी तो बुजर्गों ने भी कहा है “महंगा रोये एक बार सस्ता रोये बार बार”। रमेश ने निश्चय किया कि अब वह अपनी बहन का इलाज आयुर्वेदाचारी जी से ही करवाएगा।)

रमेश – “अनुराग किसी तरह उनसे मुलाकात का जुगाड़ कर भाई।”

अनुराग – “रमेश! वह मिलना बहुत मुश्किल है। बड़े बड़े लोगो के लिए ही बुक रहता है, फिर भी “जहाँ चाह वह��ं राह”, कोई न कोई रास्ता निकालते हैं उनसे मिलने का।”

(अनुराग ने रमेश से विदा ली, रमेश भी अपने काम पर लग गया, अब उसका मन कुछ हल्का हो गया था, एक सच्चे मित्र ने उसका थोड��� सा बोझ जो हल्का कर दिया था। आज शायद वह बहुत दिनों बाद थोडा सा सकून महसूस कर रहा था। उसे उम्मीद जागी थी �����ी बहन का इला��� अब अच्छे से हो सकेगा और वह ठीक हो जाएगी, इतने बड़े आयुर्वेदाचारी से इलाज करवाने की पहल जो हुई है, दिमाग में किसी बात या काम को पूरा करने की ठान ली जाये तो उसकी शुरुआत तो हो जी जाती है, फिर उसके लिए प्रयास करने से रस्ते भी अपने आप ही निकलते आते हैं। रमेश ने रुपयों का और अनुराग ने आयुर्वेदाचारी से मिलने का समय लेने के प्रयास शुरू किये। लगभग एक महीने बाद अनुराग इस प्रयास में सफल हुआ और आयुर्वेदाचारी से उसके भी एक महीने बाद मिलने का समय मिला। ये खुशखबरी देने अनुराग रमेश के घर पंहुचा।)

रमेश – “अरे अनुराग आओ मित्र आओ, कैसे हो?”

अनुराग – “ख़ुशी की खबर है, बाद में बतलाता हूँ पहले बताओ बहनजी कैसी है?”

रमेश – “सब बताता हूँ पहले अन्दर आ कर पानी-वानी तो पी लो।”

(चाय पानी लेने के बाद दोनों मित्र शुरू हो गए।)

अनुराग – “अरे रमेश बहुत ही मुश्किल से समय मिला है साले का (आयुर्वेदाचारी), बहुत बड़ी तोप है, यदि इतनी खुशामद भगवन की कर ले तो एक बार तो वह भी प्रकट हो जाये। पूरा एक महिना हो गया और अब भी एक महीने बाद का समय मिला है।”

रमेश – “मुझे भी पैसे का इंतजाम करने में बहुत पापड़ बेलने पड़े हैं, उन लोगो के आगे हाथ फलाये है जो गरीब को इन्सान न समझ सिर्फ गोश्त का चलता फिरता पुतला समझते हैं। चलो कोई नहीं, समय तो मिल गया ना, अब अपनी बहन का इलाज भी अछे से हो जायेगा और वो ठीक हो जाएगी।”

अनुराग – “हां यार ठीक कह रहा है, मुझे भी ऐसे-ऐसे लोगो की सिफारिश की सीढ़ी जोड़नी पड़ी है जो अब मुझसे कई गुना फायदा उठावेंगे, लेकिन एक ख़ुशी है की अपनी बहन का इलाज एक नामी-गिरामी आयुर्वेदाचारी के हाथों होगा, और वह बिलकुल ठीक हो जाएगी।”

रमेश – “हां उम्मीद पर दुनिया कायम है।”

(तय समय पर रमेश, अनुराग, रमेश की बहन माँ और पिताजी, मुह अँधेरे अपने घर से निकले और पांच छह घंटे का लम्बा सफ़र तय कर आयुर्वेदाचारी के यहाँ पहुचे। अनुराग के मन में एक अलग ही ख़ुशी थी आज, अपने समय की एक बहुत बड़ी हस्ती से मिलाने वाला था वह, जो इस समय धरती पर किसी भगवान् से कम नहीं था। जिससे मिलने के लिए उसको महीने भर की मेहनत और फिर एक महीने का इंतजार करना पड़ा था। भले ही माध्यम रमेश की बहन की बीमारी बनी थी, फिर भी वह अपनी अलग ही पहचान चाह रहा था आयुर्वेदाचारी जी के मन पर, इसीलिए उसने अपना परिधान भी अलग ही रखा था आज। फ्रेंच कट ढाढ़ी और  पठानी सूट में बड़ा ही सुन्दर लग रहा था वह। कद काठी से भी वह किसी पठान से कम नहीं था। अनुराग आज अपने आप ही में अलग लग रहा था। गाडी से उतर कर वो लोग आयुर्वेदाचारी के महलनुमा कोठी पर पहुचे, दरबान ने दरवाजे पर ही उनकी पूरी जन्मपत्री जाँच ली और अन्दर प्रतीक्षालय में बैठने को कहा। उस कमरे की सजावट-सज्जा और सामान को देख सब दंग थे, वहां बैठने पर उनको लगा सचमुच स्वर्ग में आ गए हो, अपनी सारी की सारि थकान को भूल चुके थे वो लोग, दीवारों पर भगवानो के छविचित्र के साथ साथ सुंगधित वातावरण था उस कमरे में और साथ ही साथ मधुर मधुर भक्ति संगीत बज रहा था, बड़ा ही सकारात्मक शक्तियों वाला कमरा था वह। इस बीच कब इंतजार के लगभग दो घंटे कब बीत गए पता ही नहीं चला किसी ने पानी के लिए पूछा या नहीं ये भी नहीं मालूम पड़ा उनको, तभी एक आवाज ने उनकी मन्त्रमौन को तोडा – “चलिए आपको अन्दर बुलाया है।” सभी उस शख्स के पीछे हो लिए जो उनको बुलाने आया था। सबने एक एक कर उस कमरे में प्रवेश किया, उस कमरे का वातावरण और भी अद्भुत था, पिछले कमरे से ज्यादा भक्तिमय, शक्तिमय और ऊर्जावान था ये कमरा। सामने एक बड़ा सा ऊँचा आसन था जिस पर आयुर्वेदाचारी जी विराजमान थे, उनके चेहरे पर एक अलग ही तेज उमड़ रहा था, वह उस आसन पर विराजमान ऐसा लग रहा था जैसे कोई देवता विराजमान हो। उसके साथ में ही एक छोटी सी स्टूलनुमा गद्दी थी, जिस पर शायद पीड़ित को बैठना होता था, आसन के सामने निचे बैठने के लिए कुछ गद्दिया लगी हुई थी। सबसे आगे रमेश और सबसे पीछे अनुराग था। जैसे ही उन लोगो ने गद्दियों पर बैठने के लिए अपने घुटने मोड़े एक कड़क आवाज आई, ये आवाज आयुर्वेदाचारी जी की थी।)

आयुर्वेदाचारी – “बाहर निकलो यहाँ से ….. निकलो …… निकलो ….”

(जैसे किसी कुत्ते को दुत्कारा जाता है ऐसा बर्ताव किया आयुर्वेदाचारी ने उनके साथ। सभी किसी तरह अपने को गिरने से संभाल कर बाहर निकले। सभी अपने को बहुत लज्जित अनुभव कर रहे थे, जैसे कोई दलित मंदिर में घुस गया हो और पंडित ने उसको प्रताड़ित कर उनकी आत्मा पर चोट पहुचाई हो। रमेश गरीब भले ही था लेकिन स्वाभिमानी भी बहुत था, वह अपने को बहुत लज्जित अनुभव ���र रहा था, वह तुरंत ही इस जगह को छोड़ देना चाह रहा था लेकिन अनुराग ने अपने स्वभाव के अनुरूप बड़ी मुश्किल से हाथ आये इ���� मौके को नहीं छोड़ना चाह रहा था, बहार निकलकर उसने तुरंत उस दूत से संपर्क किया जिसने आयुर्वेदाचारी जी से मिलवाने का प्रबंध किया था, अभी अनु��ाग को फोन काटे पांच मिनिट भी नहीं हुए थे कि भीतर से दुबारा बुलावा आ गया। अनुराग ने रमेश से अनुग्रह किया।)

अनुराग – “रमेश! चलो अन्दर चलते हैं अब आयुर्वेदाचारी जी हमें पहचान गए है।”

रमेश – “नहीं अनुराग! मैं ऐसे व्यक्ति से नहीं मिलना चाहता जो सामने वाले की पहचान जाने बिना ही अपना फैसला लेता हो।”

अनुराग – “अरे दोस्त! कोई बात नहीं ग़लतफ़हमी में कुछ भी हो जाता है, उसका बुरा नहीं मानना चाहिए।”

रमेश – “ग़लतफ़हमी, कैसी ग़लतफ़हमी अनुराग? क्या हम इनके पास बिना बुलाये आये थे, कोई चोर उठाईगिरे तो नहीं हैं हम। कुछ इंसानियत भी होती है, इलाज नहीं करना था तो ना करता लेकिन कम से कम हमारा परिचय जान लेने के बाद ही मना करता।”

अनुराग – “गुस्सा थूक दो भाई …… हमें अपनी बहन का इलाज करवाना है …… गरज़ हमारी अपनी है।”

रमेश – “नहीं अपमान के सामने गरज़ वरज़ सब भाड़ में जाये। कल को ये मर गया तो क्या आयुर्वेद ख़त्म हो जायेगा, क्या लोगो का आयुर्वेद से इलाज नहीं होगा या कोई ओर इतना अच्छा इलाज नहीं कर सकता, जहाँ पर ये नहीं है क्या वहां पर मरीज ठीक नहीं होते ….. “

अनुराग – “गुस्सा छोड़ दे भाई ….. “

रमेश – “मैं गुस्सा नहीं हूँ, ये मेरे अन्दर का स्वाभिमान है ……. एक से और लाख से मैं अब इसके दर्शन नहीं करना चाहता।”

अनुराग – “ठीक है तुम नहीं जाना चाहते तो न सही हम ही मिलकर आते हैं।”

(अनुराग और बाकी सब अन्दर चले गए। रमेश वहां से निकल आया वहां पर उसका दम घुट रहा था, वह विचारों में डूबा जा रहा था – “इतनी बड़ी महलनुमा कोठी अन्दर का शांत, सुमधुर, भक्तिमय वातावरण और उसमे रहने वाला उसका मालिक इतना अ-मानुसिक व्यवहार वाला। छी है ऐसे लोगो पर…… अपने को बड़ा आयुर्वेदाचारी बनता है, अरे बनता क्या है लोगों ने बना रखा है …. किसी ने ठीक ही कहा है “दूर के ढोल सुहाने होते हैं” उनकी मधुरता का तो पता तभी लगता है जब उनके पास जाना होता है। क्या इलाज करता होगा ये जब इसकी वाणी में ही मधुरता नहीं है, लेकिन फिर भी लोगों की बीमारी ठीक होती हैं, ठीक होंगी भी क्यों नहीं इतना महंगा जो है। सिर्फ अमीरजादे ही इलाज करवा सकते हैं ऐसो के पास, उनको वहम के सिवा कोई बीमारी तो होती नहीं, फिर ज्यादा पैसा ऐठना आना चाहिए वो कला तो इसमें होगी ही नहीं होती तो इतना विशाल घर नहीं बना सकता था। आज पता चल गया भगवान् भी अन्यायकारी है, पहले होता होगा “भगवान् के घर देर है अंधेर नहीं” किन्तु आज के वक्त में तो “भगवान् के घर देर नहीं अंधेर ही अंधेर है”। रमेश विचारों में ही खोया हुआ था की तभी अनुराग और सब लोग बहार आ गए)

अनुराग – “अरे यार ये तो बहुत गलत फहमी हो गयी आयुर्वेदाचारी जी को ………. वो ठहरे कट्टर धार्मिक ……… “

(रमेश इस आयुर्वेदाचारी के विषय में कुछ बात नहीं करना चाहता था। किन्तु अनुराग था की बो������ा ही चला जा रहा था।)

अनुराग – “……. मेरी पोशाक से भ्रमित हो गये थे वो, मेरी पठानी ड्रेस और उस पर फ्रेंचकट देख उन्होंने मुझे मुसलमान समझ लिया था। तभी उन्होंने हमारे साथ इतना रुखा व्यवहार किया। लेकिन एक बात तो है साले को ����नी कल�� पर बड़ी पकड़ है एक ही झटके मे��� बहन जी का मर्ज बतला दिया और बीस हज़ार रूपये का बिल बना कर सप्ताह भर की दवा देकर बोल अब दुबारा आने की जरुरत नहीं पड़ेगी।”

(एक सप्ताह बाद साँझ को अनुराग रमेश के घर पंहुचा, देख कर बहुत खुश हुआ कि बहन जी की तबियत में अब दिन रात का फर्क था, वह पहले से बहुत बेहतर थी, सप्ताह भर पहले तो उसकी आवाज भी नहीं निकल रही थी, लेकिन इस बार पानी के गिलास वही लेकर आई)

बहन जी – “नमस्ते अनुराग भैया जी! कैसे हो ?”

अनुराग – “मैं तो ठीक हूँ तुम बतलाओ अब कैसा अनुभव कर रही हो?”

बहन जी – “आप देख ही रहे हो, पहले तो बोलती बंद थी और अब …… हा…. हा…..।”

अनुराग – “ये तो आयुर्वेदाचारी जी का ही कमाल है ….. “

रमेश – “मै नहीं मानता, जिस आदमी को इन्सान की कद्र नहीं उसके अन्दर कोई कमाल नहीं होता, मेरा मानना है हमारे आयुर्वेद में ही इतनी ताकत है, यदि सही दवा दी जाये तो …….”

अनुराग – ” बहन जी! अब तो खत्म हो चुकी होगी ….?”

बहन जी – “हाँ ….. लेकिन अब फिर से दवा लेने जाना होगा ….. “

(अनुराग ने प्रश्न वाचक द्रष्टि से रमेश की तरफ देखा, रमेश अभी भी पिछली घटना से खफा था, उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी ……..)



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