दिल की बात

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विजय 'विभोर'


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मैं तुमसे ज़्यादा पढ़ी-लिखी हूँ …..

Posted On: 30 Jul, 2012  
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आदमी सड़क का……..

Posted On: 18 Jul, 2012  
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मस्ती मालगाड़ी मेट्रो लाइफ लोकल टिकेट में

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धंधे वाली औरत………

Posted On: 10 Jul, 2012  
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प्यार की निशानी……..

Posted On: 3 Apr, 2012  
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इसे तो मैं सबक सीखा कर रहूँगा …….

Posted On: 1 Apr, 2012  
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करवट फेर कर सोई

Posted On: 28 Mar, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

बाल्यान जी,मुझे बहुत दुःख है आप जैसे बुद्धिजीवी व्यक्ति भी खप पंचायतों का समर्थन करते हैं और उनके तुगलकी फरमानों को सही मानते हैं.यदि खप पंचायतों के फरमानों को स्वीकार कर लिया जाय तो भारत को तालिबान बन्ने से कोई नहीं रोक सकता .हम अपने बच्चो को सही निशा निर्देश तो दे नहीं सकते,उन्हें भला बुरा नहीं समझा सकते. परन्तु खाप में बैठ कर अमानवीय आदेश सुना कर समाज सुधार का विकल्प खोजते हैं.बलात्कारी को अपराध करने से तो रोक नहीं सकते अपनी बेटियों के भविष्य को दांव पर लगाकर समस्या का समाधान खोजते है.और परम्पराओं की दुहाई देते हैं.विकास के साथ बदलाव तो आता ही है,आवश्यकता है सार्थक समाधान खोजने की.क्षमा करें यदि कोई बात आपको बुरी लगी हो.

के द्वारा: SATYA SHEEL AGRAWAL SATYA SHEEL AGRAWAL

आदरणीय बाल्यान जी, शादी की उम्र पर आप ने सारा ध्यान केन्द्रित किया है; उम्र को लेकर खाप का समर्थन किया है; 12 वीं जमात की एक बिगड़ैल लड़की का जिक्र किया है और अंत में शादी की उचित उम्र के लिए प्रश्न करके लेख का समापन किया है | आप की सारी बातें सही हैं, किन्तु मानवीय बुद्धि, विवेक, शिक्षा, संस्कार, धर्म, दर्शन, सभ्यता, संस्कृति आदि के साथ बलात्कार के अप्रत्यक्ष समर्थन का कोई औचित्य नहीं है | जो देश जनसंख्या के बोझ से दबा जा रहा हो और कन्या भ्रूण-ह्त्या के कारण जहाँ की आबादी नर-नारी असंतुलन की विसंगति झेल रही हो, उस देश को सारे तर्कों-कुतर्कों को छोड़कर सिर्फ और सिर्फ बलात्कारियों को फाँसी की सजा सुनिश्चित कर देनी चाहिए | बाकी आप की बातों का विचार अपने ढंग से चलता रहे; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

के द्वारा: Santlal Karun Santlal Karun

आदरणीय विजय बाल्यान जी, आप ने तो पाँच कारण गिनाकर और फिर निष्कर्ष देकर "पुरुष" को क्लीन दे चिट दी -- "बलात्कार के लिए पुरुष कैसे और क्यूँ जिम्मेदार (?)|" तो फिर कुछ कदम और आगे बढ़ते हुए दिनकरकृत "उर्वशी" में आई इन पंक्तियों के हवाले से बलात्कारी को एकदम क्यों न मुक्त कर दिया जाए -- " झुके हुए हम धनुष मात्र हैं तनी हुई ज्या पर से और किसी की इच्छाओं के बाण चला करते हैं |" "बलात्कार के लिए पुरुष कैसे और क्यूँ जिम्मेदार (?)|" बिल्कुल नहीं', सब का जिम्मेदार ईश्वर, क्योंकि उसी की इच्छाओं से सब कुछ होता है | किन्तु सच तो यह है कि कोई भी विवेकवान दण्डाधिकारी उक्त दर्शन से बलात्कारी को मुक्त नहीं करेगा, क्योंकि फिल्म, टेलीविज़न, पैसा और खुद औरत महज़ उत्तेजक तत्व हो सकते हैं, ज़िम्मेदार नहीं; लिंगानुपात सामाजिक विसंगति है, उसे भी ज़िम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता | इसलिए बलात्कार का ज़िम्मेदार सिर्फ और सिर्फ "पुरुष" होता है और उसके लिए फाँसी से कम सज़ा नहीं होनी चाहिए | हाँ, मानव-समाज के हित में फिल्म-जगत, इलेक्ट्रानिक मीडिया, अर्थतंत्र और खुद औरत को स्वस्थ सभ्यता एवं श्रेयस संस्कृति को विशवासपूर्वक अपनाना होगा | इसी प्रकार लिंगानुपातिक संतुलन के लिए सामाजिक अभिकर्ताओं, सरकार में सम्मिलित नेतृत्वकर्ताओं, शासकों-प्रशासकों और जनता को मिलकर कारगर उपाय क्रियान्वित करने होंगे | अंतत: इस विषय पर श्रमसाध्य विचारणीय अभिव्यक्ति के लिए हार्दिक साधुवाद !

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